Ghazal Poetry (page 20)
वो और मोहब्बत से मुझे देख रहा हो
ज़ेब ग़ौरी
उस के क़ुर्ब के सारे ही आसार लगे
ज़ेब ग़ौरी
उजड़ी हुई बस्ती की सुब्ह ओ शाम ही क्या
ज़ेब ग़ौरी
तू पशेमाँ न हो मैं शाद हूँ नाशाद नहीं
ज़ेब ग़ौरी
ठहरा वही नायाब कि दामन में नहीं था
ज़ेब ग़ौरी
ताज़ा है उस की महक रात की रानी की तरह
ज़ेब ग़ौरी
सूरज ने इक नज़र मिरे ज़ख़्मों पे डाल के
ज़ेब ग़ौरी
सितमगरों का तरीक़-ए-जफ़ा नहीं जाता
ज़ेब ग़ौरी
शोला-ए-मौज-ए-तलब ख़ून-ए-जिगर से निकला
ज़ेब ग़ौरी
शहर में हम से कुछ आशुफ़्ता-दिलाँ और भी हैं
ज़ेब ग़ौरी
सेहन-ए-चमन में जाना मेरा और फ़ज़ा में बिखर जाना
ज़ेब ग़ौरी
रास्ते में कहीं खोना ही तो है
ज़ेब ग़ौरी
रंग-ए-ग़ज़ल में दिल का लहू भी शामिल हो
ज़ेब ग़ौरी
रात दमकती है रह रह कर मद्धम सी
ज़ेब ग़ौरी
पहले मुझ को भी ख़याल-ए-यार का धोका हुआ
ज़ेब ग़ौरी
नक़्श-ए-तस्वीर न वो संग का पैकर कोई
ज़ेब ग़ौरी
न अब्र से तिरा साया न तू निकलता है
ज़ेब ग़ौरी
मुराद-ए-शिकवा नहीं लुत्फ़-ए-गुफ़्तुगू के सिवा
ज़ेब ग़ौरी
मुझ से ऐसे वामांदा-ए-जाँ को बिस्तर-विस्तर क्या
ज़ेब ग़ौरी
मेरा अदम वजूद भी क्या ज़र-निगार था
ज़ेब ग़ौरी
मौज़ू-ए-सुख़न हिम्मत-ए-आली ही रहेगी
ज़ेब ग़ौरी
मौज-ए-रेग सराब-सहरा कैसे बनती है
ज़ेब ग़ौरी
मौजा-ए-ग़म में रवानी भी तो हो
ज़ेब ग़ौरी
मरने का सुख जीने की आसानी दे
ज़ेब ग़ौरी
मैं तिश्ना था मुझे सर-चश्मा-ए-सराब दिया
ज़ेब ग़ौरी
मैं छू सकूँ तुझे मेरा ख़याल-ए-ख़ाम है क्या
ज़ेब ग़ौरी
मैं अक्स-ए-आरज़ू था हवा ले गई मुझे
ज़ेब ग़ौरी
लहर लहर क्या जगमग जगमग होती है
ज़ेब ग़ौरी
लगाऊँ हाथ तुझे ये ख़याल-ए-ख़ाम है क्या
ज़ेब ग़ौरी
कोई भी दर न मिला नारसी के मरक़द में
ज़ेब ग़ौरी