Ghazal Poetry (page 22)

ज़िंदगी ख़ार-ज़ार में गुज़री

ज़रीना सानी

तू अपने जैसा अछूता ख़याल दे मुझ को

ज़रीना सानी

ऐ संग-ए-राह आबला-पाई न दे मुझे

ज़रीना सानी

आबला-पाई है महरूमी है रुस्वाई है

ज़रीना सानी

वो हो कैसा ही दुबला तार बिस्तर हो नहीं सकता

ज़रीफ़ लखनवी

वहशत में हर इक नक़्शा उल्टा नज़र आता है

ज़रीफ़ लखनवी

तेरे रहने को मुनासिब था कि छप्पर होता

ज़रीफ़ लखनवी

तमन्ना है किसी की तेग़ हो और अपनी गर्दन हो

ज़रीफ़ लखनवी

क़ैस कहता था यही फ़िक्र है दिन-रात मुझे

ज़रीफ़ लखनवी

मजनूँ का जो ऐ लैला जूता न फटा होता

ज़रीफ़ लखनवी

महशरिस्तान-ए-जुनूँ में दिल-ए-नाकाम आया

ज़रीफ़ लखनवी

करेंगे सब ये दा'वा नक़्द-ए-दिल जो हार बैठे हैं

ज़रीफ़ लखनवी

इल्म में झींगर से बढ़ कर कामराँ कोई नहीं

ज़रीफ़ लखनवी

ग़ुंचा-दहन वही है कि गूँगा कहें जिसे

ज़रीफ़ लखनवी

बुतों को भूल जाते हैं ख़ुदा को याद करते हैं

ज़रीफ़ लखनवी

उस शाम को जब रूठ के में घर से चला था

ज़मीर काज़मी

न आँसुओं में कभी था न दिल की आह में है

ज़मीर काज़मी

दुनिया की सल्तनत में ख़ुदा के ख़िलाफ़ हैं

ज़मीर काज़मी

मेरे ख़ुर्शीद ओ क़मर आए नहीं

ज़मीर अज़हर

किसी तरफ़ जाने का रस्ता कहीं नहीं

ज़मीर अज़हर

दिल का मौसम ज़र्द हो तो कुछ भला लगता नहीं

ज़मीर अज़हर

ये कैसा काम ऐ दस्त-ए-मसीह कर डाला

ज़मीर अतरौलवी

राहतों के धोके में इज़्तिराब ढूँडे हैं

ज़मीर अतरौलवी

ख़ाक-ज़ादे ख़ाक में या ख़ाक पर हैं आज भी

ज़मीर अतरौलवी

कमाँ पे चढ़ के ब-शक्ल-ए-ख़दंग होना पड़ा

ज़मीर अतरौलवी

जुदा उस जिस्म से हो कर कहीं तहलील हो जाता

ज़मीर अतरौलवी

अमीरों के बुरे अतवार को जो ठीक समझे है

ज़मीर अतरौलवी

तिरी यादों ने तन्हा कर दिया है

ज़मान कंजाही

पुर-हौल जंगलों की सदा मेरे साथ है

ज़मान कंजाही

नज़र में कैसा मंज़र बस गया है

ज़मान कंजाही