Ghazal Poetry (page 24)
इक इश्क़-ए-ना-तमाम है रुस्वाइयाँ तमाम
ज़ाकिर ख़ान ज़ाकिर
एहसास का क़िस्सा है सुनाना तो पड़ेगा
ज़ाकिर ख़ान ज़ाकिर
दिल के बुझते हुए ज़ख़्मों को हवा देता है
ज़ाकिर ख़ान ज़ाकिर
धूप थे सब रास्ते दरकार था साया हमें
ज़ाकिर ख़ान ज़ाकिर
दर्द शायान-ए-शान-ए-दिल भी नहीं
ज़ाकिर ख़ान ज़ाकिर
दर्द को ज़ब्त की सरहद से गुज़र जाने दो
ज़ाकिर ख़ान ज़ाकिर
चुप के सहरा में फ़क़त एक सदा कौन हूँ मैं
ज़ाकिर ख़ान ज़ाकिर
बदन के दोश पे साँसों का मक़बरा मैं हूँ
ज़ाकिर ख़ान ज़ाकिर
ऐ क़लंदर आ तसव्वुफ़ में सँवर कर रक़्स कर
ज़ाकिर ख़ान ज़ाकिर
आईना-ए-ख़याल तिरे रू-ब-रू करें
ज़ाकिर ख़ान ज़ाकिर
इश्क़ में तेरे जंगल भी घर लगते हैं
ज़किया ग़ज़ल
तिरे बग़ैर कटे दिन न शब गुज़रती है
ज़की तारिक़
सिमटे हुए जज़्बों को बिखरने नहीं देता
ज़की तारिक़
नूर ये किस का बसा है मुझ में
ज़की तारिक़
मेरे ख़्वाबों का कभी जब आसमाँ रौशन हुआ
ज़की तारिक़
कौन कहता है गुम हुआ परतव
ज़की तारिक़
इताब-ओ-क़हर का हर इक निशान बोलेगा
ज़की तारिक़
दरीदा-जैब गरेबाँ भी चाक चाहता है
ज़की तारिक़
भरे तो कैसे परिंदा भरे उड़ान कोई
ज़की तारिक़
बे-मकाँ मेरे ख़्वाब होने लगे
ज़की तारिक़
तिरी जुस्तुजू तिरी आरज़ू मुझे काम तेरे ही काम से
ज़की काकोरवी
तिरे नाज़-ओ-अदा को तेरे दीवाने समझते हैं
ज़की काकोरवी
साग़र-ओ-जाम को छलकाओ कि कुछ रात कटे
ज़की काकोरवी
दिल है बीमार क्या करे कोई
ज़की काकोरवी
ऐ दिल तिरी आहों में इतना तो असर आए
ज़की काकोरवी
आप पर जब से तबीअत आई
ज़की काकोरवी
आज फिर उन से मुलाक़ात पे रोना आया
ज़की काकोरवी
मेरी बर्बादियों की ये तस्वीर
ज़ख़मी हिसारी
उभरता चाँद सियह रात के परों में था
ज़काउद्दीन शायाँ
तंग कमरों में है महबूस फ़ज़ा का मतलब
ज़काउद्दीन शायाँ