Ghazal Poetry (page 26)
उस पे करना मिरे नालों ने असर छोड़ दिया
ज़ैनुल आब्दीन ख़ाँ आरिफ़
सब से बेहतर है कि मुझ पर मेहरबाँ कोई न हो
ज़ैनुल आब्दीन ख़ाँ आरिफ़
रात याद-ए-निगह-ए-यार ने सोने न दिया
ज़ैनुल आब्दीन ख़ाँ आरिफ़
क़ाइल भला हों नामा-बरी में सबा के ख़ाक
ज़ैनुल आब्दीन ख़ाँ आरिफ़
ना-तवानी में पलक को भी हिलाया न गया
ज़ैनुल आब्दीन ख़ाँ आरिफ़
न पर्दा खोलियो ऐ इश्क़ ग़म में तू मेरा
ज़ैनुल आब्दीन ख़ाँ आरिफ़
न आए सामने मेरे अगर नहीं आता
ज़ैनुल आब्दीन ख़ाँ आरिफ़
क्यूँ आईने में देखा तू ने जमाल अपना
ज़ैनुल आब्दीन ख़ाँ आरिफ़
क्या कहें हम थे कि या दीदा-ए-तर बैठ गए
ज़ैनुल आब्दीन ख़ाँ आरिफ़
जहाँ से दोश-ए-अज़ीज़ाँ पे बार हो के चले
ज़ैनुल आब्दीन ख़ाँ आरिफ़
इस दर पे मुझे यार मचलने नहीं देते
ज़ैनुल आब्दीन ख़ाँ आरिफ़
हम को उस शोख़ ने कल दर तलक आने न दिया
ज़ैनुल आब्दीन ख़ाँ आरिफ़
हर घड़ी चलती है तलवार तिरे कूचे में
ज़ैनुल आब्दीन ख़ाँ आरिफ़
अच्छा हुआ कि दम शब-ए-हिज्राँ निकल गया
ज़ैनुल आब्दीन ख़ाँ आरिफ़
लुत्फ़ आता है उन्हें हर ज़ुल्म-ए-नौ-ईजाद में
ज़ैनब बेगम इबरत
दस्त-ए-तलब दराज़ ज़ियादा न कर सके
ज़ैन रामिश
तू बेवफ़ा है तिरा ए'तिबार कौन करे
ज़ैग़म हमीदी
मुझ से बढ़ कर है कहीं उन का मक़ाम ऐ साक़ी
ज़ेब उस्मानिया
ख़ुद को दुनिया में जो राज़ी-ब-रज़ा कहते हैं
ज़ेब उस्मानिया
ख़ाक पर ही मिरे आँसू हैं न दामन में कहीं
ज़ेब उस्मानिया
नियाज़-ओ-नाज़ के साग़र खनक जाएँ तो अच्छा है
ज़ेब बरैलवी
मशरब-ए-हुस्न के उन्वान बदल जाते हैं
ज़ेब बरैलवी
कुछ ऐसे हाल-ओ-माज़ी तेरे अफ़्साने भी होते हैं
ज़ेब बरैलवी
इश्क़ की मंज़िल में अब तक रस्म मर जाने की है
ज़ेब बरैलवी
इस अदा से इश्क़ का आग़ाज़ होना चाहिए
ज़ेब बरैलवी
गिला नहीं कि किनारों ने साथ छोड़ दिया
ज़ेब बरैलवी
अब अश्क तो कहाँ है जो चाहूँ टपक पड़े
ज़हूरुल्लाह बदायूनी नवा
ज़ोर से थोड़ी उसे पुकारा करना है
ज़हरा क़रार
रखी न गई दिल में कोई बात छुपा कर
ज़हरा क़रार
हक़ीक़तों को फ़साना नहीं बनाती मैं
ज़हरा क़रार