Ghazal Poetry (page 27)

हक़ीक़तों को फ़साना नहीं बनाती मैं

ज़हरा क़रार

घटने वाले थे जब अज़ाब मिरे

ज़हरा क़रार

घटने वाले थे जब अज़ाब मरे

ज़हरा क़रार

चीज़ जो भूल कर गई हुई थी

ज़हरा क़रार

चीज़ जो भूल कर गई हुई थी

ज़हरा क़रार

चाँद की बेबसी को समझूँगी

ज़हरा क़रार

चाँद की बेबसी को समझूँगी

ज़हरा क़रार

आप को क्यूँ नहीं लगा पत्थर

ज़हरा क़रार

ज़ब्त-ए-ग़म मुश्किल है और मुश्किल है मुश्किल का जवाब

ज़हीर अहमद ताज

निगाह-ए-शौक़ को रुख़ पर निसार होने दो

ज़हीर अहमद ताज

नज़र को वुसअतें दे बिजलियों से आश्ना कर दे

ज़हीर अहमद ताज

नग़्मा के सोज़ से अयाँ दिल का गुदाज़ हो गया

ज़हीर अहमद ताज

मुझ पर सुरूर छा गया बादा-ए-दिल-नवाज़ से

ज़हीर अहमद ताज

मिरे दिल को मोहब्बत ख़ूब गरमाए तो अच्छा हो

ज़हीर अहमद ताज

क्यूँ वो महबूब रू-ब-रू न रहे

ज़हीर अहमद ताज

किसी की याद-ए-रंगीं में है ये दिल बे-क़रार अब तक

ज़हीर अहमद ताज

गेसू-ए-शेर-ओ-अदब के पेच सुलझाता हूँ मैं

ज़हीर अहमद ताज

दिल देख रहे हैं वो जिगर देख रहे हैं

ज़हीर अहमद ताज

ऐ मिरी जान-ए-आरज़ू माने-ए-इल्तिफ़ात क्या

ज़हीर अहमद ताज

आसूदा-ए-महफ़िल अभी दम भर न हुआ था

ज़हीर अहमद ताज

कौन कहता था कि ये भी हौसला हो जाएगा

ज़ाहिदुल हक़

इल्ज़ाम बता कौन मिरे सर नहीं आया

ज़ाहिदुल हक़

हम ने तो शराफ़त में हर चीज़ गँवा दी है

ज़ाहिदुल हक़

अब तो ये भी होने लगा है हम में उन में बात नहीं

ज़ाहिदुल हक़

आप ने हाथ रक्खा मिरे हात पर

ज़ाहिदुल हक़

वो हमें राह में मिल जाएँ ज़रूरी तो नहीं

ज़ाहिदा ज़ैदी

तपिश से फिर नग़्मा-ए-जुनूँ की सुरूद-ओ-चंग-ओ-रबाब टूटे

ज़ाहिदा ज़ैदी

तख़्ईल का दर खोले हुए शाम खड़ी है

ज़ाहिदा ज़ैदी

सिवा है हद से अब एहसास की गिरानी भी

ज़ाहिदा ज़ैदी

क़तरा-ए-आब को कब तक मिरी धरती तरसे

ज़ाहिदा ज़ैदी