Ghazal Poetry (page 25)
सियह बिस्तर पड़े हैं सुब्ह-ए-नज़्ज़ारा उतर आए
ज़काउद्दीन शायाँ
रौशनी लटकी हुई तलवार सी
ज़काउद्दीन शायाँ
रात आँसू को तिरी आँख में देखा हम ने
ज़काउद्दीन शायाँ
क़यामत का कोई हंगाम उभरे
ज़काउद्दीन शायाँ
महकी शब आईना देखे अपने बिस्तर से बाहर
ज़काउद्दीन शायाँ
ख़ाक हम मुँह पे मले आए हैं
ज़काउद्दीन शायाँ
हरे मौसम खिलेंगे सोना बन के ख़ाक बदलेगी
ज़काउद्दीन शायाँ
दरिया का चढ़ाव बाँध लेना
ज़काउद्दीन शायाँ
ये जो बिफरे हुए धारे लिए फिरता हूँ मैं
ज़करिय़ा शाज़
ये अलग बात कि चलते रहे सब से आगे
ज़करिय़ा शाज़
उतरें गहराई में तब ख़ाक से पानी आए
ज़करिय़ा शाज़
उस का ख़याल दिल में घड़ी दो घड़ी रहे
ज़करिय़ा शाज़
संग किसी के चलते जाएँ ध्यान किसी का रक्खें
ज़करिय़ा शाज़
मुझ तक निगाह आई जो वापस पलट गई
ज़करिय़ा शाज़
मोहब्बत एक ऐसा रास्ता है
ज़करिय़ा शाज़
क्या नज़ारा था मेरी आँखों में
ज़करिय़ा शाज़
किस क़यामत की घुटन तारी है
ज़करिय़ा शाज़
खोया हुआ था हासिल होने वाला हूँ
ज़करिय़ा शाज़
कहाँ दिन रात में रक्खा हुआ हूँ
ज़करिय़ा शाज़
जब भी घर के अंदर देखने लगता हूँ
ज़करिय़ा शाज़
हम तुझ से कोई बात भी करने के नहीं थे
ज़करिय़ा शाज़
दुख न सहने की सज़ाओं में घिरा रहता है
ज़करिय़ा शाज़
धूप सरों पर और दामन में साया है
ज़करिय़ा शाज़
देखो घिर कर बादल आ भी सकता है
ज़करिय़ा शाज़
छाँव से उस ने दामन भर के रक्खा है
ज़करिय़ा शाज़
कितनी ताबीरों के मुँह उतरे पड़े हैं
ज़का सिद्दीक़ी
ख़ामोशी ख़ुद अपनी सदा हो ये भी तो हो सकता है
ज़का सिद्दीक़ी
दिल ही सही समझाने वाला
ज़का सिद्दीक़ी
चेहरे जितने रूप बदलता रहता है
ज़का सिद्दीक़ी
वहशत में याद आए है ज़ंजीर देख कर
ज़ैनुल आब्दीन ख़ाँ आरिफ़