Ghazal Poetry (page 29)

वो बहर-ओ-बर में नहीं और न आसमाँ में है

ज़ाहिद चौधरी

वो आफ़्ताब में है और न माहताब में है

ज़ाहिद चौधरी

नहीं ये रस्म-ए-मोहब्बत कि इश्तिबाह करो

ज़ाहिद चौधरी

मेरा वजूद उस को गवारा नहीं रहा

ज़ाहिद चौधरी

जब आशिक़ी में मेरा कोई राज़-दाँ नहीं

ज़ाहिद चौधरी

गो मुब्तला-ए-गर्दिश-ए-शाम-ओ-सहर हूँ मैं

ज़ाहिद चौधरी

चमन में सैर-ए-गुल को जब कभी वो मह-जबीं निकले

ज़ाहिद चौधरी

चला हूँ घर से मैं अहवाल-ए-दिल सुनाने को

ज़ाहिद चौधरी

चल दिया वो उस तरह मुझ को परेशाँ छोड़ कर

ज़ाहिद चौधरी

कुछ यक़ीं रहने दिया कुछ वाहिमा रहने दिया

ज़ाहिद अाफ़ाक

ज़ख़्म-ए-ताज़ा बर्ग-ए-गुल में मुंतक़िल होते गए

ज़हीर सिद्दीक़ी

वजूद उस का कभी भी न लुक़्मा-ए-तर था

ज़हीर सिद्दीक़ी

सूखे हुए पत्तों में आवाज़ की ख़ुशबू है

ज़हीर सिद्दीक़ी

ख़्वाब-गाहों से अज़ान-ए-फ़ज्र टकराती रही

ज़हीर सिद्दीक़ी

जो हौसला हो तो हल्की है दोपहर की धूप

ज़हीर सिद्दीक़ी

हर गुल-ए-ताज़ा हमारे हाथ पर बैअत करे

ज़हीर सिद्दीक़ी

हाँ वो मैं ही था कि जिस ने ख़्वाब ढोया सुब्ह तक

ज़हीर सिद्दीक़ी

दर्द तो ज़ख़्म की पट्टी के हटाने से उठा

ज़हीर सिद्दीक़ी

चंद मोहमल सी लकीरें ही सही इफ़्शा रहूँ

ज़हीर सिद्दीक़ी

बे-बर्ग-ओ-बार राह में सूखे दरख़्त थे

ज़हीर सिद्दीक़ी

ज़र्द गुलाबों की ख़ातिर भी रोता है

ज़हीर रहमती

यूँ ही हम दर्द अपना खो रहे हैं

ज़हीर रहमती

पानी पानी रहते हैं

ज़हीर रहमती

ख़ुशी से अपना घर आबाद कर के

ज़हीर रहमती

इशारे मुद्दतों से कर रहा है

ज़हीर रहमती

दिल लगा कर पढ़ाई करते रहे

ज़हीर रहमती

बरगुज़ीदा हैं हवाओं के असर से हम भी

ज़हीर रहमती

बहुत कुछ वस्ल के इम्कान होते

ज़हीर रहमती

आईने मद्द-ए-मुक़ाबिल हो गए

ज़हीर रहमती

ये कारोबार-ए-चमन इस ने जब सँभाला है

ज़हीर काश्मीरी