Ghazal Poetry (page 21)
खुली थी आँख समुंदर की मौज-ए-ख़्वाब था वो
ज़ेब ग़ौरी
ख़ंजर चमका रात का सीना चाक हुआ
ज़ेब ग़ौरी
ख़ाक आईना दिखाती है कि पहचान में आ
ज़ेब ग़ौरी
कब तलक ये शाला-ए-बे-रंग मंज़र देखिए
ज़ेब ग़ौरी
झुके हुए पेड़ों के तनों पर छाप है चंचल धारे की
ज़ेब ग़ौरी
जाग के मेरे साथ समुंदर रातें करता है
ज़ेब ग़ौरी
हो चुके गुम सारे ख़द्द-ओ-ख़ाल मंज़र और मैं
ज़ेब ग़ौरी
हवा में उड़ता कोई ख़ंजर जाता है
ज़ेब ग़ौरी
है सदफ़ गौहर से ख़ाली रौशनी क्यूँकर मिले
ज़ेब ग़ौरी
है बहुत ताक़ वो बेदाद में डर है ये भी
ज़ेब ग़ौरी
गो मिरी हर साँस इक पेगाज़-ए-सरमस्ती रही
ज़ेब ग़ौरी
ग़ार के मुँह से ये चट्टान हटाने के लिए
ज़ेब ग़ौरी
गर्म लहू का सोना भी है सरसों की उजयाली में
ज़ेब ग़ौरी
गहरी रात है और तूफ़ान का शोर बहुत
ज़ेब ग़ौरी
इक पीली चमकीली चिड़िया काली आँख नशीली सी
ज़ेब ग़ौरी
एक किरन बस रौशनियों में शरीक नहीं होती
ज़ेब ग़ौरी
दिन तिरी याद में ढल जाता है आँसू की तरह
ज़ेब ग़ौरी
दिन है बे-कैफ़ बे-गुनाहों सा
ज़ेब ग़ौरी
ढला न संग के पैकर में यार किस का था
ज़ेब ग़ौरी
बुझते सूरज ने लिया फिर ये सँभाला कैसा
ज़ेब ग़ौरी
बुझ कर भी शो'ला दाम-ए-हवा में असीर है
ज़ेब ग़ौरी
भड़कती आग है शो'लों में हाथ डाले कौन
ज़ेब ग़ौरी
बे-कराँ दश्त-ए-बे-सदा मेरे
ज़ेब ग़ौरी
बे-हिसी पर मिरी वो ख़ुश था कि पत्थर ही तो है
ज़ेब ग़ौरी
बस एक पर्दा-ए-इग़माज़ था कफ़न उस का
ज़ेब ग़ौरी
बहार कौन सी तुझ में जमाल-ए-यार न थी
ज़ेब ग़ौरी
और गुलों का काम नहीं होता कोई
ज़ेब ग़ौरी
अक्स-ए-फ़लक पर आईना है रौशन आब ज़ख़ीरों का
ज़ेब ग़ौरी
आलम से फ़ुज़ूँ तेरा आलम नज़र आता है
ज़ेब ग़ौरी
गुल-पोश बाम-ओ-दर हैं मगर घर में कुछ नहीं
ज़ौक़ी मुज़फ्फ़र नगरी