Ghazal Poetry (page 19)

कहाँ बशारत-ए-फ़स्ल-ए-बहार लाई थी

ज़िशान इलाही

हम बे-घरों के दिल में जगाती है डर गली

ज़िशान इलाही

दिल धुआँ देने लगे आँख पिघलने लग जाए

ज़ीशान अतहर

ये इश्क़ इक इम्तिहान तो ले मैं पास कर लूँ

ज़ीशान साजिद

वक़्त की बर्फ़ है हर तौर पिघलने वाली

ज़ीशान साजिद

तुम्हारे बा'द तुम्ही तुम रहे हो आँखों में

ज़ीशान साजिद

तमन्नाएँ अज़िय्यत का नज़ारा हम न कहते थे

ज़ीशान साजिद

रेतीली कितनी हवा है इर्द-गिर्द

ज़ीशान साजिद

फैली हुई है सारी दिशाओं में रौशनी

ज़ीशान साजिद

ख़ाक हो जाएँगे किरदार ये जाने माने

ज़ीशान साजिद

कब तक वो मोहब्बत को निभाता नज़र आता

ज़ीशान साजिद

काम इतने हैं कि आराम नहीं जानते हैं

ज़ीशान साजिद

जुड़ जाएँ तसावीर तो बन जाए कहानी

ज़ीशान साजिद

जल-परी है तो वो तस्ख़ीर भी हो सकती है

ज़ीशान साजिद

जल-परी है तो वो तस्ख़ीर भी हो सकती है

ज़ीशान साजिद

हैं काम-काज इतने बदन से लिपट गए

ज़ीशान साजिद

ग़ुबार-ए-इश्क़ से हस्ती को भरने वाला हूँ मैं

ज़ीशान साजिद

दुनिया वो रास्ते की रुकावट है दोस्तो

ज़ीशान साजिद

दीवार-ओ-दर थे जान सराए निकल गए

ज़ीशान साजिद

ऐसा है कौन जो मुझे हक़ तक रसाई दे

ज़ेबुन्निसा ज़ेबी

पेच दे ज़ुल्फ़-ए-अम्बरीं न कहीं

ज़ेबा

न होगा हश्र महशर में बपा क्या

ज़ेबा

क्यूँ हो न गिर के कासा-ए-तदबीर पाश पाश

ज़ेबा

क्या मिला क़ैस को गर्द-ए-रह-ए-सहरा हो कर

ज़ेबा

किस शेर में सना-ए-रुख़-ए-मह-जबीं नहीं

ज़ेबा

जफ़ा-पसंदों को सुनते हैं ना-पसंद हुआ

ज़ेबा

फ़िराक़ में ख़ून-ए-दिल हैं पीते शराब हम ले के क्या करेंगे

ज़ेबा

फ़ैसला क्या हो जान-ए-बिस्मिल का

ज़ेबा

ऐसी तश्बीह फ़क़त हुस्न की बदनामी है

ज़ेबा

ज़ख़्म पुराने फूल सभी बासी हो जाएँगे

ज़ेब ग़ौरी