Ghazal Poetry (page 110)

मेरे होंटों को छुआ चाहती है

स्वप्निल तिवारी

मिरे घर में न होगी रौशनी क्या

स्वप्निल तिवारी

किरन इक मो'जिज़ा सा कर गई है

स्वप्निल तिवारी

कहीं खो न जाना ज़रा दूर चल के

स्वप्निल तिवारी

जिस में इक सहरा था इक दीवाना था

स्वप्निल तिवारी

हवा बातों की जो चलने लगी है

स्वप्निल तिवारी

हाँ धनक के रंग सारे खुल गए

स्वप्निल तिवारी

दिन के पहले पहर में ही अपना बिस्तर छोड़ कर

स्वप्निल तिवारी

दिन के पहले पहर मैं ही अपना बिस्तर छोड़ कर

स्वप्निल तिवारी

दिल ज़बाँ ज़ेहन मिरे आज सँवरना चाहें

स्वप्निल तिवारी

धूप के भीतर छुप कर निकली

स्वप्निल तिवारी

धीरे धीरे ढलते सूरज का सफ़र मेरा भी है

स्वप्निल तिवारी

चारों ओर समुंदर है

स्वप्निल तिवारी

अपने ख़्वाबों को इक दिन सजाते हुए

स्वप्निल तिवारी

ऐसी अच्छी सूरत निकली पानी की

स्वप्निल तिवारी

वापस घर जा ख़त्म हुआ

सालेह नदीम

वजूद मिट गया परवानों के सँभलने तक

सालेह नदीम

उस का नेज़ा था और मिरा सर था

सालेह नदीम

शिद्दत-ए-कर्ब से कराह उठा

सालेह नदीम

खिड़की दरवाज़ा खोलो

सालेह नदीम

हर क़दम साँपों की आहट और मैं

सालेह नदीम

उल्टे सीधे गिरे पड़े हैं पेड़

सूर्यभानु गुप्त

रंज इस का नहीं कि हम टूटे

सूर्यभानु गुप्त

जिन के अंदर चराग़ जलते हैं

सूर्यभानु गुप्त

हर लम्हा ज़िंदगी के पसीने से तंग हूँ

सूर्यभानु गुप्त

दिल लगाने की भूल थे पहले

सूर्यभानु गुप्त

शब-ए-विसाल मज़ा दे रही है 'तू' तेरी

सुरूर जहानाबादी

किसी मस्त-ए-ख़्वाब का है अबस इंतिज़ार सो जा

सुरूर जहानाबादी

फ़क़ीरों पे अपने करम इक ज़रा कर

सुरूर जहानाबादी

ब-ख़ुदा इश्क़ का आज़ार बुरा होता है

सुरूर जहानाबादी