Ghazal Poetry (page 111)

यही नहीं कि मिरा दिल ही मेरे बस में न था

सुरूर बाराबंकवी

वो बे-रुख़ी कि तग़ाफ़ुल की इंतिहा कहिए

सुरूर बाराबंकवी

तू उरूस-ए-शाम-ए-ख़याल भी तू जमाल-ए-रू-ए-सहर भी है

सुरूर बाराबंकवी

तू उरूस-ए-शाम-ए-ख़याल भी तो जमाल-ए-रू-ए-सहर भी है

सुरूर बाराबंकवी

सोज़-ए-ग़म भी नहीं फ़ुग़ाँ भी नहीं

सुरूर बाराबंकवी

न किसी को फ़िक्र-ए-मंज़िल न कहीं सुराग़-ए-जादा

सुरूर बाराबंकवी

मेहर-ओ-माह भी लर्ज़ां हैं फ़ज़ा की बाँहों में

सुरूर बाराबंकवी

कहे तो कौन कहे सरगुज़श्त-ए-आख़िर-ए-शब

सुरूर बाराबंकवी

कभी अपने इश्क़ पे तब्सिरे कभी तज़्किरे रुख़-ए-यार के

सुरूर बाराबंकवी

जब तलक रौशनी-ए-फ़िक्र-ओ-नज़र बाक़ी है

सुरूर बाराबंकवी

हाल में अपने मगन हो फ़िक्र-ए-आइंदा न हो

सुरूर बाराबंकवी

फ़स्ल-ए-गुल क्या कर गई आशुफ़्ता सामानों के साथ

सुरूर बाराबंकवी

दस्त-ओ-पा हैं सब के शल इक दस्त-ए-क़ातिल के सिवा

सुरूर बाराबंकवी

चमन वालों को रक़्साँ-ओ-ग़ज़ल-ख़्वाँ ले के उट्ठी है

सुरूर बाराबंकवी

चमन में लाला-ओ-गुल पर निखार भी तो नहीं

सुरूर बाराबंकवी

और कोई दम की मेहमाँ है गुज़र जाएगी रात

सुरूर बाराबंकवी

ऐ जुनूँ कुछ तो खुले आख़िर मैं किस मंज़िल में हूँ

सुरूर बाराबंकवी

आरज़ू जिन की है उन की अंजुमन तक आ गए

सुरूर बाराबंकवी

सुनी है रौशनी के क़त्ल की जब से ख़बर मैं ने

सुरूर अम्बालवी

यूँ तो सब सामान पड़ा है

सुरेन्द्र शजर

नहीं रहेगा हमेशा ग़ुबार मेरे लिए

सुरेन्द्र शजर

मेरे और अपने दरमियाँ उस ने

सुरेन्द्र शजर

मैं नहीं कहता हर इक चीज़ पुरानी ले जा

सुरेन्द्र शजर

एक दिन मेरा आईना मुझ को

सुरेन्द्र शजर

अश्क आँखों में छुपा लेता हूँ मैं

सुरेन्द्र शजर

उठो यहाँ से कहीं और जा के सो जाओ

सुरेन्द्र पंडित सोज़

अपनी अना के गुम्बद-ए-बे-दर में बंद है

सूरज तनवीर

मुस्तक़िल दर्द का सैलाब कहाँ अच्छा है

सूरज नारायण मेहर

याद है इक एक लम्हे का खिचाव देखना

सूरज नारायण

तन्हा अपनी ज़ात लिए फिरता हूँ मैं

सूरज नारायण