Ghazal Poetry (page 109)

रेत की तरह किनारों पे हैं डरने वाले

सय्यद आबिद अली आबिद

नग़्मा ऐसा भी मिरे सीना-ए-सद-चाक में है

सय्यद आबिद अली आबिद

मय हो साग़र में कि ख़ूँ रात गुज़र जाएगी

सय्यद आबिद अली आबिद

किसी की इश्वा-गरी से ब-ग़ैर-ए-फ़स्ल-ए-बहार

सय्यद आबिद अली आबिद

कहो बुतों से कि हम तब्अ सादा रखते हैं

सय्यद आबिद अली आबिद

जो भी मिंजुमला-ए-आशुफ़्ता सरा होता है

सय्यद आबिद अली आबिद

हम बिन ग़म-ए-यार भी जिए हैं

सय्यद आबिद अली आबिद

गुलों की ख़ूँ-शुदगी को शगुफ़्तगी न समझ

सय्यद आबिद अली आबिद

ग़म-ए-दौराँ ग़म-ए-जानाँ का निशाँ है कि जो था

सय्यद आबिद अली आबिद

गर्दिश-ए-जाम नहीं रुक सकती

सय्यद आबिद अली आबिद

दिन ढला शाम हुई फूल कहीं लहराए

सय्यद आबिद अली आबिद

दिल का मोआ'मला निगह-ए-आशना के साथ

सय्यद आबिद अली आबिद

दिल है आईना-ए-हैरत से दो-चार आज की रात

सय्यद आबिद अली आबिद

चाँद सितारों से क्या पूछूँ कब दिन मेरे फिरते हैं

सय्यद आबिद अली आबिद

चैन पड़ता है दिल को आज न कल

सय्यद आबिद अली आबिद

आम हो फ़ैज़-ए-बहाराँ तो मज़ा आ जाए

सय्यद आबिद अली आबिद

आई सहर क़रीब तो मैं ने पढ़ी ग़ज़ल

सय्यद आबिद अली आबिद

ये किताबों सी जो हथेली है

स्वप्निल तिवारी

ये धूप गिरी है जो मिरे लॉन में आ कर

स्वप्निल तिवारी

वो लौट आई है ऑफ़िस से हिज्र ख़त्म हुआ

स्वप्निल तिवारी

वो जहाँ हैं वहीं ख़याल मिरा

स्वप्निल तिवारी

उस के होंटों पर सुर महका करते हैं

स्वप्निल तिवारी

तुम से इक दिन कहीं मिलेंगे हम

स्वप्निल तिवारी

तेरे मिलने का आख़िरी इम्कान

स्वप्निल तिवारी

सूने सूने से फ़लक पर इक घटा बनती हुई

स्वप्निल तिवारी

समाअतों में बहुत दूर की सदा ले कर

स्वप्निल तिवारी

नींद से आ कर बैठा है

स्वप्निल तिवारी

मुँह अँधेरे तेरी यादों से निकलना है मुझे

स्वप्निल तिवारी

मिली है राहत हमें सफ़र से

स्वप्निल तिवारी

मिली है राहत हमें सफ़र से

स्वप्निल तिवारी