Ghazal Poetry (page 108)
उतर के धूप जब आएगी शब के ज़ीने से
सय्यद अहमद शमीम
ऊँची नीची पेच खाती दौड़ती काली सड़क
सय्यद अहमद शमीम
तुम मिरे पास रहो जिस्म की गरमी बख़्शो
सय्यद अहमद शमीम
था आईने के सामने चेहरा खुला हुआ
सय्यद अहमद शमीम
शोला-ए-इश्क़ में जो दिल को तपाँ रखते हैं
सय्यद अहमद शमीम
कितने जुग बीत गए फिर भी न भूला जाए
सय्यद अहमद शमीम
किस तरह ज़िंदा रहेंगे हम तुम्हारे शहर में
सय्यद अहमद शमीम
जागते में रात मुझ को ख़्वाब दिखलाया गया
सय्यद अहमद शमीम
जब सफ़र को मैं ने थामा था ये अंधा रास्ता
सय्यद अहमद शमीम
एक जग बीत गया झूम के आए बादल
सय्यद अहमद शमीम
वो बुत मुब्तला-तलब मेहर-तलब वफ़ा-तलब
सय्यद अाग़ा अली महर
वो बज़्म-ए-ग़ैर में बा-सद-वक़ार बैठे हैं
सय्यद अाग़ा अली महर
तूर-ए-दिल ख़राब बना पर बिगड़ गया
सय्यद अाग़ा अली महर
थी नज़ारे की घात आँखों में
सय्यद अाग़ा अली महर
सीने में आग आँख सू-ए-दर लगी रहे
सय्यद अाग़ा अली महर
साक़िया हो गर्मी-ए-सोहबत ज़रा बरसात में
सय्यद अाग़ा अली महर
रंगत उसे पसंद है ऐ नस्तरन सफ़ेद
सय्यद अाग़ा अली महर
नहीं दो क़ुब्बा-ए-पिस्तान शोख़-ओ-शंग सीने पर
सय्यद अाग़ा अली महर
कट गई रात सुब्ह होती है
सय्यद अाग़ा अली महर
हम ने जो उस की मिदहतों से कान भर दिए
सय्यद अाग़ा अली महर
होश का अंदाज़ा बे-होशी में है
सय्यद अाग़ा अली महर
हिज्र है दिल में ख़ाक उड़ती है
सय्यद अाग़ा अली महर
बे-जुर्म-ओ-बेगुनाह ग़रीब-उल-वतन किया
सय्यद अाग़ा अली महर
अपनी आँखों से जो वो ओझल है
सय्यद अाग़ा अली महर
अपना दुनिया से सफ़र ठहरा है
सय्यद अाग़ा अली महर
ये क्या तिलिस्म है दुनिया पे बार गुज़री है
सय्यद आबिद अली आबिद
ये अर्ज़-ए-शौक़ है आराइश-ए-बयाँ भी तो हो
सय्यद आबिद अली आबिद
यही था वक़्फ़ तिरी महफ़िल-ए-तरब के लिए
सय्यद आबिद अली आबिद
वाइज़-ए-शहर ख़ुदा है मुझे मा'लूम न था
सय्यद आबिद अली आबिद
सब के जल्वे नज़र से गुज़रे हैं
सय्यद आबिद अली आबिद