Ghazal Poetry (page 113)

जब वो तन्हा कभी हुआ होगा

सुल्तान सुकून

हुआ नहीं है अभी मुन्हरिफ़ ज़बान से वो

सुल्तान सुकून

वो आज मुझ से जब मिली तो धुँद छट गई

सुलतान सुबहानी

तेरी याद में रोते रोते तुझ जैसा हो जाएगा

सुलतान सुबहानी

तेरी आँखों पे घने ख़्वाबों का पहरा हूँ मैं

सुलतान सुबहानी

कोई भी बात न थी वारदात से पहले

सुलतान सुबहानी

जहाँ-दार जितनी भी साज़िश करेगा

सुलतान सुबहानी

देख के मुझ को हँस देता है

सुलतान सुबहानी

अभी तक साँस लम्हे बुन रही है

सुलतान सुबहानी

रात दिन शाम-ओ-सहर सब एक रंग

सुल्तान शाहिद

अपने ही टूटे हुए ख़्वाबों को दिल चुनता भी है

सुल्तान सब्र वानी

उस की जानिब देखते थे और सब ख़ामोश थे

सुलतान रशक

मेरे ख़ुश-आइंद-मुस्तक़बिल का पैग़म्बर भी तू

सुलतान रशक

मौसम-ए-गुल कुंज-ए-गुलशन निकहत-ए-गेसू न हो

सुलतान रशक

लिख रहा हूँ हर्फ़-ए-हक़ हर्फ़-ए-वफ़ा किस के लिए

सुलतान रशक

ख़ुशियाँ न छोड़ अपने लिए ग़म तलब न कर

सुलतान रशक

जो नज़र आता नहीं दीवार में दर और है

सुलतान रशक

जाने क्यूँ बातों से जलते हैं गिले करते हैं लोग

सुलतान रशक

धूप की शिद्दत में नंगे पाँव नंगे सर निकल

सुलतान रशक

बड़ी दानाई से अंदाज़-ए-अय्यारी बदलते हैं

सुलतान रशक

अजब इंसान हूँ ख़ुश-फ़हमियों के घर में रहता हूँ

सुलतान रशक

जो कश्मकश थी तिरा इंतिज़ार करते हुए

सुलतान निज़ामी

जीने की तमन्ना है न मरने की तमन्ना

सुलतान निज़ामी

झिजक रहा हूँ उसे आश्कार करते हुए

सुलतान निज़ामी

बाहर हिसार-ए-ग़म से फ़क़त देखने में था

सुलतान निज़ामी

आइनों में अक्स बिन कर जिन के पैकर आ गए

सुलतान निज़ामी

वहशत-ए-दस्त-ओ-गरेबाँ न तुझे है न मुझे

सुल्तान गौरी

हम ने माना कि जहाँ हम थे गुलिस्ताँ तो न था

सुल्तान गौरी

मैं ख़िज़ाँ को बहार करता हूँ

सुलतान फ़ारूक़ी

अपनी ज़मीं से दूर ज़मान-ओ-मकाँ से दूर

सुलतान फ़ारूक़ी