Ghazal Poetry (page 115)
जिस को क़रीब पाया उसी से लिपट गए
सुल्तान अख़्तर
झूट रौशन है कि सच्चाई नहीं जानते हैं
सुल्तान अख़्तर
जा चुका तूफ़ान लेकिन कपकपी है
सुल्तान अख़्तर
हम मुतमइन हैं उस की रज़ा के बग़ैर भी
सुल्तान अख़्तर
हरीफ़-ए-वक़्त हूँ सब से जुदा है राह मिरी
सुल्तान अख़्तर
हर-चंद अपने अक्स का दिल दर्दमंद हो
सुल्तान अख़्तर
हरा शजर न सही ख़ुश्क घास रहने दे
सुल्तान अख़्तर
हर इक लम्हा हमें हम से जुदा करती हुई सी
सुल्तान अख़्तर
हंगामों के क़हत से खिड़की दरवाज़े मबहूत
सुल्तान अख़्तर
फ़ुर्सत में रहा करते हैं फ़ुर्सत से ज़्यादा
सुल्तान अख़्तर
दस्तार-ए-एहतियात बचा कर न आएगा
सुल्तान अख़्तर
दर-ब-दर की ख़ाक पेशानी पे मल कर आएगा
सुल्तान अख़्तर
छीन ले क़ुव्वत बीनाई ख़ुदाया मुझ से
सुल्तान अख़्तर
बराए नाम सही दिन के हाथ पीले हैं
सुल्तान अख़्तर
बराए नाम सही दिन के हाथ पीले हैं
सुल्तान अख़्तर
अपनी तहज़ीब की दीवार सँभाले हुए हैं
सुल्तान अख़्तर
अब तक लहू का ज़ाइक़ा ख़ंजर पे नक़्श है
सुल्तान अख़्तर
वो सर से पाँव तलक चाहतों में डूबा था
सुलेमान ख़ुमार
तुझ से बिछड़ूँ तो ये ख़दशा है अकेला हो जाऊँ
सुलेमान ख़ुमार
शनाख़्त मिट गई चेहरे पे गर्द इतनी थी
सुलेमान ख़ुमार
शायरी मज़हर-ए-अहवाल-ए-दरूं है यूँ है
सुलेमान ख़ुमार
रोज़ ओ शब इस सोच में डूबा रहता हूँ
सुलेमान ख़ुमार
न ढलती शाम न ठंडी सहर में रक्खा है
सुलेमान ख़ुमार
मुद्दत हुई राहत भरा मंज़र नहीं उतरा
सुलेमान ख़ुमार
क्यूँ मेरे दुख चुनते हो
सुलेमान ख़ुमार
कुछ नहीं है तो ये अंदेशा ये डर कैसा है
सुलेमान ख़ुमार
कोई दिया किसी चौखट पे अब न जलने का
सुलेमान ख़ुमार
कल रात मेरे साथ अजब हादिसा हुआ
सुलेमान ख़ुमार
कचोके दिल को लगाता हुआ सा कुछ तो है
सुलेमान ख़ुमार
जब तू मुझ से रूठ गया था
सुलेमान ख़ुमार