Ghazal Poetry (page 112)

सदियों का दर्द मेरे कलेजे में पाल कर

सूरज नारायण

नोक-ए-शमशीर की घात का सिलसिला यूँ पस-ए-आइना कल उतारा गया

सूरज नारायण

न कोई नीलम न कोई हीरा न मोतियों की बहार देखी

सूरज नारायण

मैं दिन को रात के दरिया में जब उतार आया

सूरज नारायण

हमारे हाल की जा कर उन्हें ख़बर तो करें

सूरज नारायण

डालता अद्ल की झोली में स्याही कैसे

सूरज नारायण

ऐसा लगता है किसी गुम्बद से टकराई न थी

सूरज नारायण

आँख लग जाती है फिर भी जागता रहता हूँ मैं

सूरज नारायण

निगाहों ने कई सपने बुने हैं

सुनील कुमार जश्न

क्या ये ही है मेरी दुनिया मैं जिस से वाबस्ता हूँ

सुनील कुमार जश्न

किसी के ख़्वाब का साया था काफ़ी वक़्त हुआ

सुनील कुमार जश्न

ख़ुद ही पर ज़ुल्म ढाया जा रहा है

सुनील कुमार जश्न

हर इक महफ़िल में ये ही सोचता हूँ

सुनील कुमार जश्न

हाए वो याद कहाँ है कि ख़ुदा ख़ैर करे

सुनील कुमार जश्न

दौर-ए-बरहम बे-मअ'नी

सुनील कुमार जश्न

अजब सी बद-हवासी छा रही है

सुनील कुमार जश्न

अब तो दिल ओ दिमाग़ में कोई ख़याल भी नहीं

सुनील कुमार जश्न

आबरू की किसे ज़रूरत है

सुनील कुमार जश्न

सुनहरी धूप खिली है कई दिनों के ब'अद

सुनील आफ़ताब

रौशनी क्या पड़ी है कमरे में

सुनील आफ़ताब

रंग होने लगे ज़ाहिर मेरे

सुनील आफ़ताब

कोई शय है जो सनसनाती है

सुनील आफ़ताब

कोई शय है जो सनसनाती है

सुनील आफ़ताब

हर एक सम्त इशारे थे और रस्ता भी

सुनील आफ़ताब

हर एक डूबता मंज़र दिखाई देता है

सुनील आफ़ताब

धूप में बैठने के दिन आए

सुनील आफ़ताब

ऐसी ख़ुशबू तू मुझे आज मयस्सर कर दे

सुमन ढींगरा दुग्गल

ठंडी है या गर्म हवा है

सुल्तान सुकून

सो उस को छोड़ दिया उस ने जब वफ़ा नहीं की

सुल्तान सुकून

सो उस को छोड़ दिया उस ने जब वफ़ा नहीं की

सुल्तान सुकून