Ghazal Poetry (page 32)
रंज राहत-असर न हो जाए
ज़हीर देहलवी
रंग जमने न दिया बात को चलने न दिया
ज़हीर देहलवी
रहता तो है उस बज़्म में चर्चा मिरे दिल का
ज़हीर देहलवी
फटा पड़ता है जोबन और जोश-ए-नौ-जवानी है
ज़हीर देहलवी
पान बन बन के मिरी जान कहाँ जाते हैं
ज़हीर देहलवी
नौ-गिरफ़्तार-ए-क़फ़स हूँ मुझे कुछ याद नहीं
ज़हीर देहलवी
नसीहत-गरो दिल लगाया तो होता
ज़हीर देहलवी
मुरादें कोई पाता है किसी की जान जाती है
ज़हीर देहलवी
मिलने का नहीं रिज़्क़-ए-मुक़द्दर से सिवा और
ज़हीर देहलवी
क्यूँ किसी से वफ़ा करे कोई
ज़हीर देहलवी
कुफ़्र में भी हम रहे क़िस्मत से ईमाँ की तरफ़
ज़हीर देहलवी
कुछ शिकवे-गिले होते कुछ तैश सिवा होता
ज़हीर देहलवी
कुछ न कुछ रंज वो दे जाते हैं आते जाते
ज़हीर देहलवी
जाते हो तुम जो रूठ के जाते हैं जी से हम
ज़हीर देहलवी
जहाँ में कौन कह सकता है तुम को बेवफ़ा तुम हो
ज़हीर देहलवी
इश्क़ और इश्क़-ए-शोला-वर की आग
ज़हीर देहलवी
हाथ से हैहात क्या जाता रहा
ज़हीर देहलवी
हसीनों में रुत्बा दो-बाला है तेरा
ज़हीर देहलवी
हरीफ़-ए-राज़ हैं ऐ बे-ख़बर दर-ओ-दीवार
ज़हीर देहलवी
हम-नशीं उन के तरफ़-दार बने बैठे हैं
ज़हीर देहलवी
हाए उस शोख़ का अंदाज़ से आना शब-ए-वस्ल
ज़हीर देहलवी
हाए काफ़िर तिरे हमराह अदू आता है
ज़हीर देहलवी
गुल-अफ़्शानी के दम भरती है चश्म-ए-ख़ूँ-फ़िशाँ क्या क्या
ज़हीर देहलवी
गुल हुआ ये किस की हस्ती का चराग़
ज़हीर देहलवी
ग़ौग़ा-ए-पंद गो न रहा नौहागर रहा
ज़हीर देहलवी
गेसू से अंबरी है सबा और सबा से हम
ज़हीर देहलवी
फ़ित्ना-गर शोख़ी-ए-हया कब तक
ज़हीर देहलवी
दिल को दार-उस-सुरूर कहते हैं
ज़हीर देहलवी
दिल को आज़ार लगा वो कि छुपा भी न सकूँ
ज़हीर देहलवी
दिल गया दिल का निशाँ बाक़ी रहा
ज़हीर देहलवी