Ghazal Poetry (page 34)
मैं तुम्हें फूल कहूँ तुम मुझे ख़ुश्बू देना
ज़फ़र सहबाई
कभी कभी कोई चेहरा ये काम करता है
ज़फ़र सहबाई
जब अधूरे चाँद की परछाईं पानी पर पड़ी
ज़फ़र सहबाई
जब अधूरे चाँद की परछाईं पानी पर पड़ी
ज़फ़र सहबाई
हरे पत्तो सुनहरी धूप की क़ुर्बत में ख़ुश रहना
ज़फ़र सहबाई
गुल हैं तो आप अपनी ही ख़ुश्बू में सोचिए
ज़फ़र सहबाई
चिलचिलाती धूप ने ग़ुस्सा उतारा हर जगह
ज़फ़र सहबाई
बे-हिसी पर हिस्सियत की दास्ताँ लिख दीजिए
ज़फ़र सहबाई
बदन पर सब्ज़ मौसम छा रहे हैं
ज़फ़र सहबाई
अमीर-ए-शहर इस इक बात से ख़फ़ा है बहुत
ज़फ़र सहबाई
अक्स ज़ख़्मों का जबीं पर नहीं आने देता
ज़फ़र सहबाई
ऐ हम-सफ़र ये राह-बरी का गुमान छोड़
ज़फ़र सहबाई
ज़र्द पत्तों को हवा साथ लिए फिरती है
ज़फ़र रबाब
सानेहा रोज़ नया हो तो ग़ज़ल क्या कहिए
ज़फ़र रबाब
मुज़्महिल क़दमों पे बार
ज़फ़र रबाब
मर्ग-ए-एहसास बिल-यक़ीन आख़िर
ज़फ़र रबाब
जाँ रहे नोचते हयात के दुख
ज़फ़र रबाब
तमाम रंग जहाँ इल्तिजा के रक्खे थे
ज़फ़र मुरादाबादी
रात भर सूरज के बन कर हम-सफ़र वापस हुए
ज़फ़र मुरादाबादी
निगाह-ए-हुस्न-ए-मुजस्सम अदा को छूते ही
ज़फ़र मुरादाबादी
नक़ाब उस ने रुख़-ए-हुस्न-ए-ज़र पे डाल दिया
ज़फ़र मुरादाबादी
ख़ुश-गुमाँ हर आसरा बे-आसरा साबित हुआ
ज़फ़र मुरादाबादी
कभी दुआ तो कभी बद-दुआ से लड़ते हुए
ज़फ़र मुरादाबादी
हर्फ़-ए-तदबीर न था हर्फ़-ए-दिलासा रौशन
ज़फ़र मुरादाबादी
हर इंतिख़ाब यहाँ माज़ी-ओ-अक़ब का है
ज़फ़र मुरादाबादी
बे-क़नाअत क़ाफ़िले हिर्स-ओ-हवा ओढ़े हुए
ज़फ़र मुरादाबादी
बढ़े कुछ और किसी इल्तिजा से कम न हुए
ज़फ़र मुरादाबादी
मुझे लगते हैं प्यारे तितलियाँ जुगनू परिंदे
ज़फ़र ख़ान नियाज़ी
निकाह कर नहीं सकती वो मुझ फ़क़ीर के साथ
ज़फ़र कमाली
नाम से गाँधी के चिढ़ बैर आज़ादी से है
ज़फ़र कमाली