Ghazal Poetry (page 36)
जो बे-घर हैं उन्हें घर की दुआ देती हैं दीवारें
ज़फ़र इक़बाल ज़फ़र
जिस रोज़ से अपना मुझे इदराक हुआ है
ज़फ़र इक़बाल ज़फ़र
हर आदमी कहाँ औज-ए-कमाल तक पहुँचा
ज़फ़र इक़बाल ज़फ़र
एक जुम्बिश में कट भी सकते हैं
ज़फ़र इक़बाल ज़फ़र
एक इक पल तिरा नायाब भी हो सकता है
ज़फ़र इक़बाल ज़फ़र
दिल-ओ-निगाह को वीरान कर दिया मैं ने
ज़फ़र इक़बाल ज़फ़र
दरिया गुज़र गए हैं समुंदर गुज़र गए
ज़फ़र इक़बाल ज़फ़र
चमका जो तीरगी में उजाला बिखर गया
ज़फ़र इक़बाल ज़फ़र
आइना देखें न हम अक्स ही अपना देखें
ज़फ़र इक़बाल ज़फ़र
ज़िंदा भी ख़ल्क़ में हूँ मरा भी हुआ हूँ मैं
ज़फ़र इक़बाल
ज़मीं पे एड़ी रगड़ के पानी निकालता हूँ
ज़फ़र इक़बाल
'ज़फ़र' फ़सानों कि दास्तानों में रह गए हैं
ज़फ़र इक़बाल
यूँ तो किस चीज़ की कमी है
ज़फ़र इक़बाल
यूँ तो है ज़ेर-ए-नज़र हर माजरा देखा हुआ
ज़फ़र इक़बाल
यूँ भी होता है कि यक दम कोई अच्छा लग जाए
ज़फ़र इक़बाल
ये ज़मीन आसमान का मुमकिन
ज़फ़र इक़बाल
ये नहीं कहता कि दोबारा वही आवाज़ दे
ज़फ़र इक़बाल
ये भी मुमकिन है कि आँखें हों तमाशा ही न हो
ज़फ़र इक़बाल
ये बात अलग है मिरा क़ातिल भी वही था
ज़फ़र इक़बाल
यक़ीं की ख़ाक उड़ाते गुमाँ बनाते हैं
ज़फ़र इक़बाल
यकसू भी लग रहा हूँ बिखरने के बावजूद
ज़फ़र इक़बाल
यहाँ सब से अलग सब से जुदा होना था मुझ को
ज़फ़र इक़बाल
यहाँ किसी को भी कुछ हस्ब-ए-आरज़ू न मिला
ज़फ़र इक़बाल
वो एक तरहा से इक़रार करने आया था
ज़फ़र इक़बाल
वही मिरे ख़स-ओ-ख़ाशाक से निकलता है
ज़फ़र इक़बाल
वीराँ थी रात चाँद का पत्थर सियाह था
ज़फ़र इक़बाल
उठ और फिर से रवाना हो डर ज़ियादा नहीं
ज़फ़र इक़बाल
उसी से आए हैं आशोब आसमाँ वाले
ज़फ़र इक़बाल
तिलिस्म-ए-होश-रुबा में पतंग उड़ती है
ज़फ़र इक़बाल
थकना भी लाज़मी था कुछ काम करते करते
ज़फ़र इक़बाल