Ghazal Poetry (page 38)
मक़्बूल-ए-अवाम हो गया मैं
ज़फ़र इक़बाल
मैं ने कब दावा किया था सर-ब-सर बाक़ी हूँ मैं
ज़फ़र इक़बाल
मैं ज़र्द आग न पानी के सर्द डर में रहा
ज़फ़र इक़बाल
मैं भी शरीक-ए-मर्ग हूँ मर मेरे सामने
ज़फ़र इक़बाल
लर्ज़िश-ए-पर्दा-ए-इज़हार का मतलब क्या है
ज़फ़र इक़बाल
लहर की तरह किनारे से उछल जाना है
ज़फ़र इक़बाल
लब पे तकरीम-ए-तमन्ना-ए-सुबुक-पाई है
ज़फ़र इक़बाल
कुफ़्र से ये जो मुनव्वर मिरी पेशानी है
ज़फ़र इक़बाल
कुछ उस ने सोचा तो था मगर काम कर दिया था
ज़फ़र इक़बाल
कुछ सबब ही न बने बात बढ़ा देने का
ज़फ़र इक़बाल
कुछ नहीं समझा हूँ इतना मुख़्तसर पैग़ाम था
ज़फ़र इक़बाल
कुछ दिनों से जो तबीअत मिरी यकसू कम है
ज़फ़र इक़बाल
कुछ भी न उस की ज़ीनत-ओ-ज़ेबाई से हुआ
ज़फ़र इक़बाल
कोई किनाया कहीं और बात करते हुए
ज़फ़र इक़बाल
किसी नई तरहा की रवानी में जा रहा था
ज़फ़र इक़बाल
किस नए ख़्वाब में रहता हूँ डुबोया हुआ मैं
ज़फ़र इक़बाल
ख़ुशी मिली तो ये आलम था बद-हवासी का
ज़फ़र इक़बाल
ख़ुश बहुत फिरते हैं वो घर में तमाशा कर के
ज़फ़र इक़बाल
खींच लाई है यहाँ लज़्ज़त-ए-आज़ार मुझे
ज़फ़र इक़बाल
खिड़कियाँ किस तरह की हैं और दर कैसा है वो
ज़फ़र इक़बाल
ख़ामुशी अच्छी नहीं इंकार होना चाहिए
ज़फ़र इक़बाल
खड़ी है शाम कि ख़्वाब-ए-सफ़र रुका हुआ है
ज़फ़र इक़बाल
कैसी रुकी हुई थी रवानी मिरी तरफ़
ज़फ़र इक़बाल
कभी अव्वल नज़र आना कभी आख़िर होना
ज़फ़र इक़बाल
कब वो ज़ाहिर होगा और हैरान कर देगा मुझे
ज़फ़र इक़बाल
जो नारवा था इस को रवा करने आया हूँ
ज़फ़र इक़बाल
जो बंदा-ए-ख़ुदा था ख़ुदा होने वाला है
ज़फ़र इक़बाल
जिस्म के रेगज़ार में शाम-ओ-सहर सदा करूँ
ज़फ़र इक़बाल
जिस ने नफ़रत ही मुझे दी न 'ज़फ़र' प्यार दिया
ज़फ़र इक़बाल
जैसी अब है ऐसी हालत में नहीं रह सकता
ज़फ़र इक़बाल