Ghazal Poetry (page 39)
जहाँ निगार-ए-सहर पैरहन उतारती है
ज़फ़र इक़बाल
जहाँ मेरे न होने का निशाँ फैला हुआ है
ज़फ़र इक़बाल
जहाँ लम्हा-ए-शाम बिखेर दिया
ज़फ़र इक़बाल
इतना ठहरा हुआ माहौल बदलना पड़ जाए
ज़फ़र इक़बाल
इसे मंज़ूर नहीं छोड़ झगड़ता क्या है
ज़फ़र इक़बाल
ईमाँ के साथ ख़ामी-ए-ईमाँ भी चाहिए
ज़फ़र इक़बाल
इल्ज़ाम एक ये भी उठा लेना चाहिए
ज़फ़र इक़बाल
हम ने आवाज़ न दी बर्ग ओ नवा होते हुए
ज़फ़र इक़बाल
हज़ार बंदिश-ए-औक़ात से निकलता है
ज़फ़र इक़बाल
हवा-ए-वादी-ए-दुश्वार से नहीं रुकता
ज़फ़र इक़बाल
हवा बदल गई उस बेवफ़ा के होने से
ज़फ़र इक़बाल
हमें भी मतलब-ओ-मअ'नी की जुस्तुजू है बहुत
ज़फ़र इक़बाल
हमारे सर से वो तूफ़ाँ कहीं गुज़र गए हैं
ज़फ़र इक़बाल
है कोई इख़्तियार दुनिया पर
ज़फ़र इक़बाल
है और बात बहुत मेरी बात से आगे
ज़फ़र इक़बाल
हद हो चक्की है शर्म-ए-शकेबाई ख़त्म हो
ज़फ़र इक़बाल
गिरने की तरह का न सँभलने की तरह का
ज़फ़र इक़बाल
एक ही नक़्श है जितना भी जहाँ रह जाए
ज़फ़र इक़बाल
एक ही बार नहीं है वो दोबारा कम है
ज़फ़र इक़बाल
दिन पर सोच सुलगती है या कभी रात के बारे में
ज़फ़र इक़बाल
दिल को रहीन-ए-बंद-ए-क़बा मत किया करो
ज़फ़र इक़बाल
दिल का ये दश्त अरसा-ए-महशर लगा मुझे
ज़फ़र इक़बाल
देखो तो कुछ ज़ियाँ नहीं खोने के बावजूद
ज़फ़र इक़बाल
दरिया-ए-तुंद-मौज को सहरा बताइए
ज़फ़र इक़बाल
दरिया दूर नहीं और प्यासा रह सकता हूँ
ज़फ़र इक़बाल
छुपा हुआ जो नुमूदार से निकल आया
ज़फ़र इक़बाल
चमके गा अभी मेरे ख़यालात से आगे
ज़फ़र इक़बाल
चमकती वुसअतों में जो गुल-ए-सहरा खिला है
ज़फ़र इक़बाल
चलो इतनी तो आसानी रहेगी
ज़फ़र इक़बाल
बीनाई से बाहर कभी अंदर मुझे देखे
ज़फ़र इक़बाल