Ghazal Poetry (page 40)

बिखर बिखर गए अल्फ़ाज़ से अदा न हुए

ज़फ़र इक़बाल

बिजली गिरी है कल किसी उजड़े मकान पर

ज़फ़र इक़बाल

भूल बैठा था मगर याद भी ख़ुद मैं ने किया

ज़फ़र इक़बाल

बेवफ़ाई करके निकलूँ या वफ़ा कर जाऊँगा

ज़फ़र इक़बाल

ब-ज़ाहिर सेहत अच्छी है जो बीमारी ज़ियादा है

ज़फ़र इक़बाल

बस एक बार किसी ने गले लगाया था

ज़फ़र इक़बाल

बहुत सुलझी हुई बातों को भी उलझाए रखते हैं

ज़फ़र इक़बाल

बदला ये लिया हसरत-ए-इज़हार से हम ने

ज़फ़र इक़बाल

बात ऐसी भी कोई नहीं कि मोहब्बत बहुत ज़ियादा है

ज़फ़र इक़बाल

अपने इंकार के बर-अक्स बराबर कोई था

ज़फ़र इक़बाल

अजब कोई ज़ोर-ए-बयाँ हो गया हूँ

ज़फ़र इक़बाल

ऐसी कोई दरपेश हवा आई हमारे

ज़फ़र इक़बाल

अगर कभी तिरे आज़ार से निकलता हूँ

ज़फ़र इक़बाल

अगर इस खेल में अब वो भी शामिल होने वाला है

ज़फ़र इक़बाल

अभी तो करना पड़ेगा सफ़र दोबारा मुझे

ज़फ़र इक़बाल

अभी किसी के न मेरे कहे से गुज़रेगा

ज़फ़र इक़बाल

अभी आँखें खुली हैं और क्या क्या देखने को

ज़फ़र इक़बाल

आतश ओ इंजिमाद है मुझ में

ज़फ़र इक़बाल

आग का रिश्ता निकल आए कोई पानी के साथ

ज़फ़र इक़बाल

साहिल पर दरिया की लहरें सज्दा करती रहती हैं

ज़फर इमाम

मेरे अंदर का ग़ुरूर अंदर गुज़रता रह गया

ज़फर इमाम

मैं ही दस्तक देने वाला मैं ही दस्तक सुनने वाला

ज़फर इमाम

इक नदी में सैकड़ों दरिया की तुग़्यानी मिली

ज़फर इमाम

धूप निकली कभी बादल से ढकी रहती है

ज़फर इमाम

दर्द बहता है दरिया के सीने में पानी नहीं

ज़फर इमाम

भले ही आँख मिरी सारी रात जागेगी

ज़फर इमाम

तू ख़ुद भी नहीं और तिरा सानी नहीं मिलता

ज़फ़र हमीदी

मेरे नाज़ुक सवाल में उतरो

ज़फ़र हमीदी

मैं ज़िंदगी का नक़्शा तरतीब दे रहा हूँ

ज़फ़र हमीदी

क्यूँ मैं हाइल हो जाता हूँ अपनी ही तन्हाई में

ज़फ़र हमीदी