Ghazal Poetry (page 42)
ख़्वाब रंगों से बनी है याद ताज़ा
ज़फ़र गौरी
जारी है कब से मा'रका ये जिस्म-ओ-जाँ में सर्द सा
ज़फ़र गौरी
फ़स्ल-ए-गुल को ज़िद है ज़ख़्म दिल का हरा कैसे हो
ज़फ़र गौरी
दिल में रख ज़ख़्म-ए-नवा राह में काम आएगा
ज़फ़र गौरी
चल पड़े हम दश्त-ए-बे-साया भी जंगल हो गया
ज़फ़र गौरी
ज़हर-ए-ग़म दिल में समोने भी नहीं देता है
ज़फ़र अनवर
सर में सौदा भी वही कूचा-ए-क़ातिल भी वही
ज़फ़र अनवर
जैब ओ गरेबाँ टुकड़े टुकड़े दामन को भी तार किया
ज़फ़र अनवर
ये जो तेरी आँखों में मा'नी-ए-वफ़ा सा है
ज़फ़र अंसारी ज़फ़र
ये दश्त-ए-शौक़ का लम्बा सफ़र अच्छा नहीं लगता
ज़फ़र अंसारी ज़फ़र
उस से मेरा तो कोई दूर का रिश्ता भी नहीं
ज़फ़र अंसारी ज़फ़र
तिरे क़रीब रहूँ या कि मैं सफ़र में रहूँ
ज़फ़र अंसारी ज़फ़र
सिरहाने बेबसी रोती रही है
ज़फ़र अंसारी ज़फ़र
मुझ को ता-उम्र तड़पने की सज़ा ही देना
ज़फ़र अंसारी ज़फ़र
मोहब्बत पे शायद ज़वाल आ रहा है
ज़फ़र अंसारी ज़फ़र
मोहब्बत की बुलंदी से कभी उतरा नहीं जाता
ज़फ़र अंसारी ज़फ़र
कभी किसी को जो देखा किसी की बाँहों में
ज़फ़र अंसारी ज़फ़र
जब भी माज़ी के नज़ारे को नज़र जाएगी
ज़फ़र अंसारी ज़फ़र
इन की नज़रों में न बन जाए तमाशा चेहरा
ज़फ़र अंसारी ज़फ़र
हर इक शय इश्तिहारी हो गई है
ज़फ़र अंसारी ज़फ़र
हालत-ए-बीमार-ए-ग़म पर जिस को हैरानी नहीं
ज़फ़र अंसारी ज़फ़र
ग़म इतने अपने दामन-ए-दिल से लिपट गए
ज़फ़र अंसारी ज़फ़र
आप की मुझ पे जब भी नवाज़िश हुई
ज़फ़र अंसारी ज़फ़र
फिरे हैं धुन में तिरी हम इधर उधर तन्हा
ज़फ़र अकबराबादी
दुनिया मिज़ाज-दान-ओ-मिज़ाज-आश्ना न थी
ज़फ़र अकबराबादी
ये अहद क्या है कि सब पर गिराँ गुज़रता है
ज़फ़र अज्मी
उम्मीद-ए-सुब्ह-ए-बहाराँ ख़िज़ाँ से खींचते हैं
ज़फ़र अज्मी
तू ने क्यूँ हम से तवक़्क़ो न मुसाफ़िर रक्खी
ज़फ़र अज्मी
ख़ुशा ऐ ज़ख़्म कि सूरत नई निकलती है
ज़फ़र अज्मी
जान-ए-बे-ताब अजब तेरे ठिकाने निकले
ज़फ़र अज्मी