Ghazal Poetry (page 43)
हर सम्त शोर-ए-बंदा ओ साहिब है शहर में
ज़फ़र अज्मी
बदन से रूह तलक हम लहू लहू हुए हैं
ज़फ़र अज्मी
आ के जब ख़्वाब तुम्हारे ने कहा बिस्मिल्लाह
ज़फ़र अज्मी
तिरे फ़िराक़ में घुटनों चली है तन्हाई
ज़फ़र अहमद परवाज़
यारो हर ग़म ग़म-ए-याराँ है क़रीब आ जाओ
यूसुफ़ ज़फ़र
यारो हर ग़म ग़म-ए-याराँ है क़रीब आ जाओ
यूसुफ़ ज़फ़र
वो मेरी जान है दिल से कभी जुदा न हुआ
यूसुफ़ ज़फ़र
तामीर-ए-ज़िंदगी को नुमायाँ किया गया
यूसुफ़ ज़फ़र
शहर लगता है बयाबान मुझे
यूसुफ़ ज़फ़र
पुकारता हूँ कि तुम हासिल-ए-तमन्ना हो
यूसुफ़ ज़फ़र
पानी को आग कह के मुकर जाना चाहिए
यूसुफ़ ज़फ़र
मैं लिपटता रहा हूँ ख़ारों से
यूसुफ़ ज़फ़र
मैं हूँ तेरे लिए बेनाम-ओ-निशाँ आवारा
यूसुफ़ ज़फ़र
क्या ढूँडने आए हो नज़र में
यूसुफ़ ज़फ़र
जो हुरूफ़ लिख गया था मिरी आरज़ू का बचपन
यूसुफ़ ज़फ़र
जिस का बदन है ख़ुश्बू जैसा जिस की चाल सबा सी है
यूसुफ़ ज़फ़र
हम गरचे दिल ओ जान से बेज़ार हुए हैं
यूसुफ़ ज़फ़र
है गुलू-गीर बहुत रात की पहनाई भी
यूसुफ़ ज़फ़र
बे-तलब एक क़दम घर से न बाहर जाऊँ
यूसुफ़ ज़फ़र
ऐ बे-ख़बरी जी का ये क्या हाल है कल से
यूसुफ़ ज़फ़र
वैसे तो थे यार बहुत पर किसी ने मुझे पहचाना था
यूसुफ़ तक़ी
उसी यक़ीन उसी दस्त-ओ-पा की हाजत है
यूसुफ़ तक़ी
तेरी यादें भी नहीं ग़म भी नहीं तू भी नहीं
यूसुफ़ तक़ी
रात चौपाल और अलाव मियाँ
यूसुफ़ तक़ी
पटरियों की चमकती हुई धार पर फ़ासले अपनी गर्दन कटाते रहे
यूसुफ़ तक़ी
मिरे भी सुर्ख़-रू होने का इक मौक़ा निकल आता
यूसुफ़ तक़ी
लम्हा लम्हा फैलती जाती है रात
यूसुफ़ तक़ी
जाने कितनी देर चलेगी साथ मिरे चमकीली धूप
यूसुफ़ तक़ी
इतना करम कि अज़्म रहे हौसला रहे
यूसुफ़ तक़ी
हर लहज़ा मिरी ज़ीस्त मुझे बार-ए-गराँ है
यूसुफ़ तक़ी