Ghazal Poetry (page 45)

कहिए किन लफ़्ज़ों में अश्कों की कहानी लिक्खूँ

यूनुस ग़ाज़ी

दर्द हद से सिवा दिया तू ने

यूनुस ग़ाज़ी

चुप रहूँ कैसे मैं बर्बाद-ए-जहाँ होने तक

यूनुस ग़ाज़ी

बताऊँ मैं तुम्हें आँखों में आँसू या लहू क्या है

यूनुस ग़ाज़ी

तेरी आँखों से मिली जुम्बिश मिरी तहरीर को

योगेन्द्र बहल तिश्ना

दर्द-ओ-ग़म रंज-ओ-अलम आह-ओ-फ़ुग़ाँ

योगेन्द्र बहल तिश्ना

आती है फ़ुग़ाँ लब पे मिरे क़ल्ब-ओ-जिगर से

योगेन्द्र बहल तिश्ना

ज़िंदा रहने का वो अफ़्सून-ए-अजब याद नहीं

यज़दानी जालंधरी

तन्हाई में अक्सर यही महसूस हुआ है

यज़दानी जालंधरी

सूरज के साथ साथ उभारे गए हैं हम

यज़दानी जालंधरी

सहन-ए-चमन में हर-सू पत्थर

यज़दानी जालंधरी

निगाह-ए-नाज़ का हासिल है ए'तिबार मुझे

यज़दानी जालंधरी

मिला है तपता सहरा देखने को

यज़दानी जालंधरी

लबों तक आया ज़बाँ से मगर कहा न गया

यज़दानी जालंधरी

जल्वा अफ़रोज़ है कअ'बे के उजालों की तरह

यज़दानी जालंधरी

जहाँ कुछ लोग दीवाने बने हैं

यज़दानी जालंधरी

जादा-ए-ज़ीस्त पे बरपा है तमाशा कैसा

यज़दानी जालंधरी

इक ख़ुशी के लिए हैं कितने ग़म

यज़दानी जालंधरी

सहने को तो सह जाएँ ग़म-ए-कौन-ओ-मकाँ तक

यावर अब्बास

कुछ लोग जो नख़वत से मुझे घूर रहे हैं

यावर अब्बास

भीगी पलकें शौक़ का आलम वक़्त का धारा क्या नहीं देखा

यावर अब्बास

पर्दा आँखों से हटाने में बहुत देर लगी

यासमीन हामिद

मुझे आगही का निशाँ समझ के मिटाओ मत

यासमीन हामिद

उफ़ुक़ तक मेरा सहरा खिल रहा है

यासमीन हमीद

मुसलसल एक ही तस्वीर चश्म-ए-तर में रही

यासमीन हमीद

मिसाल-ए-अक्स मिरे आइने में ढलता रहा

यासमीन हमीद

कोई पूछे मिरे महताब से मेरे सितारों से

यासमीन हमीद

इतने आसूदा किनारे नहीं अच्छे लगते

यासमीन हमीद

हम ने किसी को अहद-ए-वफ़ा से रिहा किया

यासमीन हमीद

हमें ख़बर थी बचाने का उस में यारा नहीं

यासमीन हमीद