Ghazal Poetry (page 47)
वस्ल भी हिज्र था विसाल न था
यशब तमन्ना
तर्क उल्फ़त में भी उस ने ये रिवायत रक्खी
यशब तमन्ना
तअल्लुक़ उस से अगरचे मिरा ख़राब रहा
यशब तमन्ना
पढ़ चुके हैं निसाब-ए-तंहाई
यशब तमन्ना
लबों से आश्नाई दे रहा है
यशब तमन्ना
ख़्वाब ता'बीर में बदलता है
यशब तमन्ना
कमाल-ए-शौक़-ए-सफ़र भी उधर ही जाता है
यशब तमन्ना
दर्द की लहर थी गुज़र भी गई
यशब तमन्ना
चाह थी मेहर थी मोहब्बत थी
यशब तमन्ना
ऐसा भी नहीं दर्द ने वहशत नहीं की है
यशब तमन्ना
ख़ुदा-रा आ के मिरी लो ख़बर कहाँ हो तुम
यासीन ज़मीर
करम नहीं तो सितम ही सही रवा रखना
यासीन क़ुदरत
ज़ेहन का कुछ मुंतशिर तो हाल का ख़स्ता रहा
यासीन अफ़ज़ाल
ज़ख़्म मेरे दिल पे इक ऐसा लगा
यासीन अफ़ज़ाल
रेत के इक शहर में आबाद हैं दर दर के लोग
यासीन अफ़ज़ाल
पलकों पे रुका क़तरा-ए-मुज़्तर की तरह हूँ
यासीन अफ़ज़ाल
बारिश रुकी वबाओं का बादल भी छट गया
यासीन अफ़ज़ाल
सुख़न को बे-हिसी की क़ैद से बाहर निकालूँ
याक़ूब यावर
शहर-ए-सुख़न अजीब हो गया है
याक़ूब यावर
रौशनी मेरे चराग़ों की धरी रहना थी
याक़ूब यावर
मिरी दुआओं की सब नग़्मगी तमाम हुई
याक़ूब यावर
मसअलों की भीड़ में इंसाँ को तन्हा कर दिया
याक़ूब यावर
लर्ज़ां तरसाँ मंज़र चुप
याक़ूब यावर
जो तू नहीं तो मौसम-ए-मलाल भी न आएगा
याक़ूब यावर
हम अपनी पुश्त पर खुली बहार ले के चल दिए
याक़ूब यावर
अल-अमाँ कि सूरज है मेरी जान के पीछे
याक़ूब यावर
ज़बाँ कुछ और कहती है नज़र कुछ और कहती है
याक़ूब उस्मानी
वो कौन से ख़तरे हैं जो गुलशन में नहीं हैं
याक़ूब उस्मानी
उमंगों में वही जोश-ए-तमन्ना-ज़ाद बाक़ी है
याक़ूब उस्मानी
तूफ़ाँ की ज़द पे अपना सफ़ीना जब आ गया
याक़ूब उस्मानी