Ghazal Poetry (page 48)

तज़ाद अच्छा नहीं तर्ज़-ए-बयाँ का हम ज़बानों में

याक़ूब उस्मानी

शौक़ की कम-निगही भी है गवारा मुझ को

याक़ूब उस्मानी

सब्र ख़ुद उकता गया अच्छा हुआ

याक़ूब उस्मानी

निगाह-ए-बद-गुमाँ है और मैं हूँ

याक़ूब उस्मानी

मज़ाक़-ए-काविश-ए-पिन्हाँ अब इतना आम क्या होगा

याक़ूब उस्मानी

मैं चाहूँ भी तो ज़ब्त-ए-गुफ़्तुगू मैं ला नहीं सकता

याक़ूब उस्मानी

ख़ुश-फ़हमियों को ग़ौर का यारा नहीं रहा

याक़ूब उस्मानी

करम के इस दौर-ए-इम्तिहाँ से वो दौर-ए-मश्क़-ए-सितम ही अच्छा

याक़ूब उस्मानी

हल ही न हो जिस का वो मुअम्मा तो नहीं है

याक़ूब उस्मानी

चाहती है आख़िर क्या आगही ख़ुदा-मालूम

याक़ूब उस्मानी

रू-ब-रू बुत के दुआ की भूल हो जाए तो फिर

याक़ूब तसव्वुर

मुसाफ़िरों के ये वहम-ओ-गुमाँ में था ही नहीं

याक़ूब तसव्वुर

मिरे चारों तरफ़ एक आहनी दीवार क्यूँ है

याक़ूब तसव्वुर

हुसूल-ए-रिज़्क़ के अरमाँ निकालते गुज़री

याक़ूब तसव्वुर

हर एक गाम पे इक बुत बनाना चाहा है

याक़ूब तसव्वुर

गर्दिश-ए-मुक़द्दर का सिलसिला जो चल जाए

याक़ूब तसव्वुर

दिलों में दर्द ही उतना कशीद रक्खा है

याक़ूब तसव्वुर

दरून-ए-हल्का-ए-ज़ंजीर हूँ मैं

याक़ूब तसव्वुर

ज़िंदगी दश्त-ए-बला हो जैसे

याक़ूब राही

सुर्ख़ लावे की तरह तप के निखरना सीखो

याक़ूब राही

मुशाहिदा न कोई तजरबा न ख़्वाब कोई

याक़ूब राही

कोई बे-नाम ख़लिश उकसाए

याक़ूब राही

कोई बादल तपिश-ए-ग़म से पिघलता ही नहीं

याक़ूब राही

ख़ून की एक नदी और बहेगी शायद

याक़ूब राही

ख़ुद पे इल्ज़ाम क्यूँ धरो बाबा

याक़ूब राही

जागे ज़मीर ज़ेहन खुले ताज़गी मिले

याक़ूब राही

हवा-ए-सुब्ह-ए-नुमू दुश्मन-ए-चमन कैसे

याक़ूब राही

दर्द उस का उभर रहा होगा

याक़ूब राही

वो राहबर तो नहीं था इआदा क्या करता

याक़ूब आरिफ़

था उस का जैसा अमल वो ही यार मैं भी करूँ

याक़ूब आरिफ़