Ghazal Poetry (page 46)
एक इक हर्फ़ समेटो मुझे तहरीर करो
यासमीन हमीद
इक बे-पनाह रात का तन्हा जवाब था
यासमीन हमीद
दौलत-ए-दर्द समेटो कि बिखरने को है
यासमीन हमीद
दरिया की रवानी वही दहशत भी वही है
यासमीन हमीद
अता-ए-अब्र से इंकार करना चाहिए था
यासमीन हमीद
ये कमरा और ये गर्द-ओ-ग़ुबार उस का है
यासमीन हबीब
वक़्त बस रेंगता है उम्र के साथ
यासमीन हबीब
मुझ को उतार हर्फ़ में जान-ए-ग़ज़ल बना मुझे
यासमीन हबीब
लम्स-ए-तिश्ना-लबी से गुज़री है
यासमीन हबीब
किसी के साथ किया निस्बत हुई थी
यासमीन हबीब
किसी कशिश के किसी सिलसिले का होना था
यासमीन हबीब
जो चला गया सो चला गया जो है पास उस का ख़याल रख
यासमीन हबीब
इक दिल में था इक सामने दरिया उसे कहना
यासमीन हबीब
अभी गुज़रे दिनों की कुछ सदाएँ शोर करती हैं
यासमीन हबीब
आते रहते हैं फ़लक से भी इशारे कुछ न कुछ
यासमीन हबीब
याद-ए-ख़ुदा से आया न ईमाँ किसी तरह
यासीन अली ख़ाँ मरकज़
शिर्क का पर्दा उठाया यार ने
यासीन अली ख़ाँ मरकज़
जो नज़र किया मैं सिफ़ात में हुआ मुझ पे कब ये अयाँ नहीं
यासीन अली ख़ाँ मरकज़
जहाँ बात वहदत की गहरी रहेगी
यासीन अली ख़ाँ मरकज़
ग़फ़लत अजब है हम को दम जिस का मारते हैं
यासीन अली ख़ाँ मरकज़
ढूँढता हक़ को दर-ब-दर है तू
यासीन अली ख़ाँ मरकज़
ढूँढ हम उन को परेशान बने बैठे हैं
यासीन अली ख़ाँ मरकज़
अयाँ हो आप बेगाना बनाया
यासीन अली ख़ाँ मरकज़
अपना पता मुझे बता बहर-ए-ख़ुदा तू कौन है
यासीन अली ख़ाँ मरकज़
अजब भूल ओ हैरत जो मख़्लूक़ को है
यासीन अली ख़ाँ मरकज़
आशिक़ी के आश्कारे हो चुके
यासीन अली ख़ाँ मरकज़
आप को भूल के मैं याद-ए-ख़ुदा करता हूँ
यासीन अली ख़ाँ मरकज़
यूँ बाग़ कोई हम ने उजड़ता नहीं देखा
यशपाल गुप्ता
तेरे अल्ताफ़ का लुत्फ़ उठाते रहे
यशपाल गुप्ता
वो जो एक चेहरा दमक रहा है जमाल से
यशब तमन्ना