Ghazal Poetry (page 44)
हाल कुछ अब के जुदा है तिरे दीवानों का
यूसुफ़ तक़ी
घुटी घुटी ही सही मेरी चाह ले लेना
यूसुफ़ तक़ी
दिल में जब कभी तेरी याद सो गई होगी
यूसुफ़ तक़ी
दर्द की ख़ुशबू से ये महका रहा
यूसुफ़ तक़ी
बरसों बअ'द जो देखा उस को सर पर उलझा जोड़ा था
यूसुफ़ तक़ी
ज़ख़्मों की मुनाजात में पिन्हाँ वो असर था
युसूफ़ जमाल
उन्हें क़ैद करने की कोशिश है कैसी
युसूफ़ जमाल
सोचा कि वा हो सब्ज़ दरीचा जो बंद था
युसूफ़ जमाल
सारा बदन है ख़ून से क्यूँ तर उसे दिखा
युसूफ़ जमाल
सर पर दुख का ताज सुहाना लगता है
युसूफ़ जमाल
लग़्ज़िशें तन्हाइयों की सब बता दी जाएँगी
युसूफ़ जमाल
कोरे काग़ज़ की तरह बे-नूर बाबों में रहा
युसूफ़ जमाल
हम रिवायत के साँचे में ढलते भी हैं
युसूफ़ जमाल
उसी हरीफ़ की ग़ारत-गरी का डर भी था
यूसुफ़ हसन
पहले मैं तेरी नज़र में आया
यूसुफ़ हसन
क्या रूप बरस रहा है
यूसुफ़ हसन
कितने पेच-ओ-ताब में ज़ंजीर होना है मुझे
यूसुफ़ हसन
ख़्वाब आईना कर रही है दिल में
यूसुफ़ हसन
हर नज़र में है असासा अपना
यूसुफ़ हसन
आँख में ठहरा हुआ सपना बिखर भी जाएगा
यूसुफ़ हसन
तन्हाई की क़ब्र से उठ कर मैं सड़कों पर खो जाता हूँ
यूसुफ़ आज़मी
सिमटे रहे तो दर्द की तन्हाइयाँ मिलीं
यूसुफ़ आज़मी
कितनी हसीन लगती है चेहरों की ये किताब
यूसुफ़ आज़मी
होंटों के सहीफ़ों पे है आवाज़ का चेहरा
यूसुफ़ आज़मी
तुम्हारी जुस्तुजू की है वहाँ तक
यूनुस ग़ाज़ी
रू-ब-रू हैं वो देखता क्या है
यूनुस ग़ाज़ी
क़ैद-ए-उल्फ़त का मज़ा ज़ुल्फ़-ए-गिरह-गीर में है
यूनुस ग़ाज़ी
पास होते हुए जुदा क्यूँ है
यूनुस ग़ाज़ी
क्या सर-ए-तहरीर है और क्या पस-ए-तहरीर देख
यूनुस ग़ाज़ी
ख़ून-ए-तमन्ना रंग लाया हो ऐसा भी हो सकता है
यूनुस ग़ाज़ी