Ghazal Poetry (page 49)
न चारागर न मसीहा न राहबर था मैं
याक़ूब आरिफ़
ये हम ने माना कि होगा विसाल-ए-यार नसीब
याक़ूब अली आसी
दाग़-हा-ए-दिल की ताबानी गई
याक़ूब अली आसी
आप अपना निशाँ नहीं मा'लूम
याक़ूब अली आसी
नज़रों में कहाँ उस की वो पहला सा रहा मैं
याक़ूब आमिर
न पूछो ज़ीस्त-फ़साना तमाम होने तक
याक़ूब आमिर
क्या हुआ हम से जो दुनिया बद-गुमाँ होने लगी
याक़ूब आमिर
इक ख़ला सा है जिधर देखो इधर कुछ भी नहीं
याक़ूब आमिर
चंद घंटे शोर ओ ग़ुल की ज़िंदगी चारों तरफ़
याक़ूब आमिर
अगरचे हाल ओ हवादिस की हुक्मरानी है
याक़ूब आमिर
आतिश-ए-ग़म में भभूका दीदा-ए-नमनाक था
याक़ूब आमिर
ये वो आँसू हैं जिन से ज़ोहरा आतिशनाक हो जावे
इनामुल्लाह ख़ाँ यक़ीन
यार कब दिल की जराहत पे नज़र करता है
इनामुल्लाह ख़ाँ यक़ीन
उम्र आख़िर है जुनूँ कर लूँ बहाराँ फिर कहाँ
इनामुल्लाह ख़ाँ यक़ीन
शहर में था न तिरे हुस्न का ये शोर कभू
इनामुल्लाह ख़ाँ यक़ीन
सरीर-ए-सल्तनत से आस्तान-ए-यार बेहतर था
इनामुल्लाह ख़ाँ यक़ीन
पड़ गई दिल में तिरे तशरीफ़ फ़रमाने में धूम
इनामुल्लाह ख़ाँ यक़ीन
नहीं मा'लूम अब की साल मय-ख़ाने पे क्या गुज़रा
इनामुल्लाह ख़ाँ यक़ीन
मिस्र में हुस्न की वो गर्मी-ए-बाज़ार कहाँ
इनामुल्लाह ख़ाँ यक़ीन
कार-ए-दीं उस बुत के हाथों हाए अबतर हो गया
इनामुल्लाह ख़ाँ यक़ीन
इस क़दर ग़र्क़ लहू में ये दिल-ए-ज़ार न था
इनामुल्लाह ख़ाँ यक़ीन
हक़ मुझे बातिल-आशना न करे
इनामुल्लाह ख़ाँ यक़ीन
चला आँखों से जब कश्ती में वो महबूब जाता है
इनामुल्लाह ख़ाँ यक़ीन
बहार आई है क्या क्या चाक जैब-ए-पैरहन करते
इनामुल्लाह ख़ाँ यक़ीन
अगरचे इश्क़ में आफ़त है और बला भी है
इनामुल्लाह ख़ाँ यक़ीन
उस की याद और दर्द की सौग़ात मेरे साथ थी
यहया ख़ालिद
रौशनी का क़ालिब जब तीरगी में ढलता है
यहया ख़ालिद
ज़माना ख़ुदा को ख़ुदा जानता है
यगाना चंगेज़ी
यार है आइना है शाना है
यगाना चंगेज़ी
यकसाँ कभी किसी की न गुज़री ज़माने में
यगाना चंगेज़ी