Ghazal Poetry (page 37)
तिरे रास्तों से जभी गुज़र नहीं कर रहा
ज़फ़र इक़बाल
तिरे लबों पे अगर सुर्ख़ी-ए-वफ़ा ही नहीं
ज़फ़र इक़बाल
तिरे आसमाँ की ज़मीं हो गया हूँ
ज़फ़र इक़बाल
तक़ाज़ा हो चुकी है और तमन्ना हो रहा है
ज़फ़र इक़बाल
सोचता हूँ कि अपनी रज़ा के लिए छोड़ दूँ
ज़फ़र इक़बाल
सिर्फ़ आँखें थीं अभी उन में इशारे नहीं थे
ज़फ़र इक़बाल
सिमटने की हवस क्या थी बिखरना किस लिए है
ज़फ़र इक़बाल
शब भर रवाँ रही गुल-ए-महताब की महक
ज़फ़र इक़बाल
सफ़र कठिन ही सही जान से गुज़रना क्या
ज़फ़र इक़बाल
रुख़-ए-ज़ेबा इधर नहीं करता
ज़फ़र इक़बाल
रह रह के ज़बानी कभी तहरीर से हम ने
ज़फ़र इक़बाल
रफ़्ता रफ़्ता लग चुके थे हम भी दीवारों के साथ
ज़फ़र इक़बाल
फिर कोई शक्ल नज़र आने लगी पानी पर
ज़फ़र इक़बाल
पता चला कोई गिर्दाब से गुज़रते हुए
ज़फ़र इक़बाल
परियों ऐसा रूप है जिस का लड़कों ऐसा नाँव
ज़फ़र इक़बाल
पैदा ये ग़ुबार क्यूँ हुआ है
ज़फ़र इक़बाल
पाए हुए इस वक़्त को खोना ही बहुत है
ज़फ़र इक़बाल
नहीं कि तेरे इशारे नहीं समझता हूँ
ज़फ़र इक़बाल
नहीं कि दिल में हमेशा ख़ुशी बहुत आई
ज़फ़र इक़बाल
न उस को भूल पाए हैं न हम ने याद रक्खा है
ज़फ़र इक़बाल
न कोई ज़ख़्म लगा है न कोई दाग़ पड़ा है
ज़फ़र इक़बाल
न कोई बात कहनी है न कोई काम करना है
ज़फ़र इक़बाल
न गुमाँ रहने दिया है न यक़ीं रहने दिया
ज़फ़र इक़बाल
न घाट है कोई अपना न घर हमारा हुआ
ज़फ़र इक़बाल
मुस्तरद हो गया जब तेरा क़ुबूला हुआ मैं
ज़फ़र इक़बाल
मिलूँ उस से तो मिलने की निशानी माँग लेता हूँ
ज़फ़र इक़बाल
मिला तो मंज़िल-ए-जाँ में उतारने न दिया
ज़फ़र इक़बाल
मिरे निशान बहुत हैं जहाँ भी होता हूँ
ज़फ़र इक़बाल
मेरे अंदर वो मेरे सिवा कौन था
ज़फ़र इक़बाल
मौसम का हाथ है न हवा है ख़लाओं में
ज़फ़र इक़बाल