Ghazal Poetry (page 35)

मोहब्बत की जिस को ख़ुमारी लगे

ज़फ़र कमाली

किसी का हो नहीं सकता है कोई काम रोज़े में

ज़फ़र कमाली

इश्क़ जब से हो गया इक लखनवी ख़ातून से

ज़फ़र कमाली

हँसी में हक़ जता कर घर-जमाई छीन लेता है

ज़फ़र कमाली

तब्-ए-रौशन को मिरी कुछ इस तरह भाई ग़ज़ल

ज़फ़र कलीम

सिमटूँ तो सिफ़्र सा लगूँ फैलूँ तो इक जहाँ हूँ मैं

ज़फ़र कलीम

सर्द रुतों में लोगों को गर्मी पहुँचाने वाले हाथ

ज़फ़र कलीम

फूला-फला शजर तो समर पर भी आएगा

ज़फ़र कलीम

नवा-ए-हक़ पे हूँ क़ातिल का डर अज़ीज़ नहीं

ज़फ़र कलीम

मुझ को समझो न हर्फ़-ए-ग़लत की तरह

ज़फ़र कलीम

खुल गईं आँखें कि जब दुनिया का सच हम पर खुला

ज़फ़र कलीम

खिड़की से महताब न देखो

ज़फ़र कलीम

इन दिनों मैं ग़ुर्बतों की शाम के मंज़र में हूँ

ज़फ़र कलीम

हो चुकी हिजरत तो फिर क्या फ़र्ज़ है घर देखना

ज़फ़र कलीम

गुमान तक में न था महव-ए-यास कर देगा

ज़फ़र कलीम

घर से निकाले पाँव तो रस्ते सिमट गए

ज़फ़र कलीम

चल पड़े तो फिर अपनी धुन में बे-ख़बर बरसों

ज़फ़र कलीम

बख़्त जागे तो जहाँ-दीदा सी हो जाती है

ज़फ़र कलीम

बात मेहंदी से लहू तक आ गई

ज़फ़र कलीम

ज़िंदगी को शो'बदा समझा था मैं

ज़फ़र इक़बाल ज़फ़र

ज़िंदगी को कर गया जंगल कोई

ज़फ़र इक़बाल ज़फ़र

वो नहीं उस की मगर जादूगरी मौजूद है

ज़फ़र इक़बाल ज़फ़र

सर-बुरीदा हुआ मुक़ाबिल है

ज़फ़र इक़बाल ज़फ़र

सहरा का सफ़र था तो शजर क्यूँ नहीं आया

ज़फ़र इक़बाल ज़फ़र

सफ़र का सिलसिला आख़िर कहाँ तमाम करूँ

ज़फ़र इक़बाल ज़फ़र

राब्ता क्यूँ रखूँ मैं दरिया से

ज़फ़र इक़बाल ज़फ़र

पाई हमेशा रेत भँवर काटने के बा'द

ज़फ़र इक़बाल ज़फ़र

लबों पर प्यास सब के बे-कराँ है

ज़फ़र इक़बाल ज़फ़र

लबों पर प्यास सब के बे-कराँ है

ज़फ़र इक़बाल ज़फ़र

कनीज़-ए-वक़्त को नीलाम कर दिया सब ने

ज़फ़र इक़बाल ज़फ़र