Ghazal Poetry (page 33)
दे हश्र के वादे पे उसे कौन भला क़र्ज़
ज़हीर देहलवी
बुतों से बच के चलने पर भी आफ़त आ ही जाती है
ज़हीर देहलवी
बिगड़ कर अदू से दिखाते हैं आप
ज़हीर देहलवी
भूल कर हरगिज़ न लेते हम ज़बाँ से नाम-ए-इश्क़
ज़हीर देहलवी
बज़्म-ए-दुश्मन में जा के देख लिया
ज़हीर देहलवी
ऐसे की मोहब्बत को मोहब्बत न कहेंगे
ज़हीर देहलवी
ऐ मेहरबाँ है गर यही सूरत निबाह की
ज़हीर देहलवी
अभी से आ गईं नाम-ए-ख़ुदा हैं शोख़ियाँ क्या-क्या
ज़हीर देहलवी
सूखी ज़मीं को याद के बादल भिगो गए
ज़हीर अहमद ज़हीर
रात भर फ़ुर्क़त के साए दिल को दहलाते रहे
ज़हीर अहमद ज़हीर
जो ज़ेहन ओ दिल में इकट्ठा था आस का पानी
ज़हीर अहमद ज़हीर
ग़ुरूर-ओ-नाज़-ओ-तकब्बुर के दिन तो कब के गए
ज़हीर अहमद ज़हीर
इक शजर ऐसा मोहब्बत का लगाया जाए
ज़फर ज़ैदी
न कहो तुम भी कुछ न हम बोलें
ज़फ़र ताबिश
कितने हाथ सवाली हैं
ज़फ़र ताबिश
गिर गए जब सब्ज़ मंज़र टूट कर
ज़फ़र ताबिश
ब-ज़ाहिर यूँ तो मैं सिमटा हुआ हूँ
ज़फ़र ताबिश
बस्ती बस्ती जंगल जंगल घूमा मैं
ज़फ़र ताबिश
आँगन-आँगन जारी धूप
ज़फ़र ताबिश
याद में तेरी दो-आलम को भुलाना है हमें
ज़फ़र ताबाँ
याद में तेरी दो आलम को भुलाना है हमें
ज़फ़र ताबाँ
उम्र-ए-अबद का मा-हसल इश्क़ का दौर-ए-ना-तमाम
ज़फ़र ताबाँ
उम्र-ए-अबद का मा-हसल इश्क़ का दौर-ए-ना-तमाम
ज़फ़र ताबाँ
ज़हर-ए-साअत ही पिएँ जिस्म तह-ए-ख़ाक तो हो
ज़फ़र सिद्दीक़ी
तमाम शहर में कोई भी रू-शनास न था
ज़फ़र सिद्दीक़ी
ये क्या तहरीर पागल लिख रहा है
ज़फ़र सहबाई
शब के ग़म दिन के अज़ाबों से अलग रखता हूँ
ज़फ़र सहबाई
सब्ज़े से सब दश्त भरे हैं ताल भरे हैं पानी से
ज़फ़र सहबाई
रखा है बज़्म में उस ने चराग़ कर के मुझे
ज़फ़र सहबाई
रखा है बज़्म में उस ने चराग़ कर के मुझे
ज़फ़र सहबाई