Ghazal Poetry (page 430)

ये और बात कि मौजूद अपने घर में हूँ

नासिर अली सय्यद

एक अनहोनी का डर है और मैं

नासिर अली सय्यद

ये दश्त-ओ-दमन कोह ओ कमर किस के लिए है

नश्तर ख़ानक़ाही

तेज़-रौ पानी की तीखी धार पर बहते हुए

नश्तर ख़ानक़ाही

तामीर हम ने की थी हमीं ने गिरा दिए

नश्तर ख़ानक़ाही

सुरमई धूप में दिन सा नहीं होने पाता

नश्तर ख़ानक़ाही

शजर आँगन का जब सूरज से लर्ज़ां होने लगता था

नश्तर ख़ानक़ाही

सहरा का पता दे न समुंदर का पता दे

नश्तर ख़ानक़ाही

रुख़ पे भूली हुई पहचान का डर तो आया

नश्तर ख़ानक़ाही

रुख़ बदलते हिचकिचाते थे कि डर ऐसा भी था

नश्तर ख़ानक़ाही

क़हर था हिजरत में ख़ुद को बे-अमाँ करना तिरा

नश्तर ख़ानक़ाही

पेशानी-ए-हयात पे कुछ ऐसे बल पड़े

नश्तर ख़ानक़ाही

न मिल सका कहीं ढूँडे से भी निशान मिरा

नश्तर ख़ानक़ाही

मुसाफ़िर ख़ाना-ए-इम्काँ में बिस्तर छोड़ जाते थे

नश्तर ख़ानक़ाही

मेरे बदन की आग ही झुलसा गई मुझे

नश्तर ख़ानक़ाही

क्या ख़बर है न मिले फिर कोई शीशा ऐसा

नश्तर ख़ानक़ाही

ख़ुश-फ़हमियों को दर्द का रिश्ता अज़ीज़ था

नश्तर ख़ानक़ाही

खिड़कियाँ मत खोल जिंस-ए-जाँ उठा ले जाएगा

नश्तर ख़ानक़ाही

कशिश तो अब भी ग़ज़ब की है नाज़नीनों में

नश्तर ख़ानक़ाही

कभी तो मुल्तवी ज़िक्र-ए-जहाँ-गर्दां भी होना था

नश्तर ख़ानक़ाही

इल्म किस को था कि तर्सील-ए-हवा रुक जाएगी

नश्तर ख़ानक़ाही

हर बार नया ले के जो फ़ित्ना नहीं आया

नश्तर ख़ानक़ाही

धज्जी धज्जी जुब्बा-ओ-दस्तार होते देखना

नश्तर ख़ानक़ाही

धड़का था दिल कि प्यार का मौसम गुज़र गया

नश्तर ख़ानक़ाही

देखा नहीं देखे हुए मंज़र के सिवा कुछ

नश्तर ख़ानक़ाही

चुप थे बरगद ख़ुश्क मौसम का गिला करते न थे

नश्तर ख़ानक़ाही

छा गया सर पे मिरे गर्द का धुँदला बादल

नश्तर ख़ानक़ाही

बहुत क़रीब है पत-झड़ की रुत पलक न उठा

नश्तर ख़ानक़ाही

अभी तक जब हमें जीना न आया

नश्तर ख़ानक़ाही

आप अपनी ज़ात में सिमटा हुआ आलम तमाम

नश्तर ख़ानक़ाही