Ghazal Poetry (page 428)

पिछले पहर का सन्नाटा था

नासिर काज़मी

फिर सावन रुत की पवन चली तुम याद आए

नासिर काज़मी

पत्थर का वो शहर भी क्या था

नासिर काज़मी

पर्दे में हर आवाज़ के शामिल तो वही है

नासिर काज़मी

पल पल काँटा सा चुभता था

नासिर काज़मी

ओ मेरे मसरूफ़ ख़ुदा

नासिर काज़मी

निय्यत-ए-शौक़ भर न जाए कहीं

नासिर काज़मी

'नासिर' क्या कहता फिरता है कुछ न सुनो तो बेहतर है

नासिर काज़मी

नए कपड़े बदल कर जाऊँ कहाँ और बाल बनाऊँ किस के लिए

नासिर काज़मी

नए देस का रंग नया था

नासिर काज़मी

मुसलसल बेकली दिल को रही है

नासिर काज़मी

मुमकिन नहीं मता-ए-सुख़न मुझ से छीन ले

नासिर काज़मी

मुझ को और कहीं जाना था

नासिर काज़मी

मैं ने जब लिखना सीखा था

नासिर काज़मी

मैं जब तेरे घर पहुँचा था

नासिर काज़मी

मैं हूँ रात का एक बजा है

नासिर काज़मी

कुंज कुंज नग़्मा-ज़न बसंत आ गई

नासिर काज़मी

कुछ यादगार-ए-शहर-ए-सितमगर ही ले चलें

नासिर काज़मी

कुछ तो एहसास-ए-ज़ियाँ था पहले

नासिर काज़मी

किसी कली ने भी देखा न आँख भर के मुझे

नासिर काज़मी

ख़्वाब में रात हम ने क्या देखा

नासिर काज़मी

ख़मोशी उँगलियाँ चटख़ा रही है

नासिर काज़मी

कौन उस राह से गुज़रता है

नासिर काज़मी

कम-फ़ुर्सती-ए-ख़्वाब-ए-तरब याद रहेगी

नासिर काज़मी

जुर्म-ए-उम्मीद की सज़ा ही दे

नासिर काज़मी

जब ज़रा तेज़ हवा होती है

नासिर काज़मी

जब रात गए तिरी याद आई सौ तरह से जी को बहलाया

नासिर काज़मी

इस से पहले कि बिछड़ जाएँ हम

नासिर काज़मी

इन सहमे हुए शहरों की फ़ज़ा कुछ कहती है

नासिर काज़मी

होती है तेरे नाम से वहशत कभी कभी

नासिर काज़मी