Ghazal Poetry (page 438)
ये दौर गुज़रा कभी न देखीं पिया की अँखियाँ ख़ुमार-मतियाँ
नाजी शाकिर
तेरे भाई को चाहा अब तेरी करता हूँ पा-बोसी
नाजी शाकिर
मह-रुख़ाँ की जो मेहरबानी है
नाजी शाकिर
लब-ए-शीरीं है मिस्री यूसुफ़-ए-सानी है ये लड़का
नाजी शाकिर
कमर की बात सुनते हैं ये कुछ पाई नहीं जाती
नाजी शाकिर
दिल का खोज न पाया हरगिज़ देखा खोल जो क़ब्रों को
नाजी शाकिर
देखी बहार हम ने कल ज़ोर मय-कदे में
नाजी शाकिर
देख मोहन तिरी कमर की तरफ़
नाजी शाकिर
ऐ सबा कह बहार की बातें
नाजी शाकिर
निगाह-ओ-रुख़ पर है लिखी जाती जो बात लब पर रुकी हुई है
नजीबा आरिफ़, मोईनुद्दीन आक़िल
ढूँढती फिरती है अब उस को निगाह-ए-वापसीं
नजीब रामिश
बस्ती बस्ती ख़त-ए-गुम-गश्ता सा आवारा हूँ
नजीब रामिश
ज़रूरत कुछ ज़ियादा हो न जाए
नजीब अहमद
ज़र्द पत्तों को दरख़्तों से जुदा होना ही था
नजीब अहमद
यक़ीं ने मुझ को असीर-ए-गुमाँ न रहने दिया
नजीब अहमद
वही रटे हुए जुमले उगल रहा हूँ अभी
नजीब अहमद
थकन से चूर बदन धूल में अटा सर था
नजीब अहमद
तेरे हमदम तिरे हमराज़ हुआ करते थे
नजीब अहमद
तिरा रंग-ए-बसीरत हू-ब-हू मुझ सा निकल आया
नजीब अहमद
शब के ख़िलाफ़ बरसर-ए-पैकार कब हुए
नजीब अहमद
शब भली थी न दिन बुरा था कोई
नजीब अहमद
सर-ए-नियाज़ वो सौदा नज़र नहीं आता
नजीब अहमद
पैरहन उड़ जाएगा रंग-ए-क़बा रह जाएगा
नजीब अहमद
निशाँ किसी को मिलेगा भला कहाँ मेरा
नजीब अहमद
नाव ख़स्ता भी न थी मौज में दरिया भी न था
नजीब अहमद
मौत से ज़ीस्त की तकमील नहीं हो सकती
नजीब अहमद
कुछ इस के सिवा ख़्वाहिश-ए-सादा नहीं रखते
नजीब अहमद
किरन तो घर के अंदर आ गई थी
नजीब अहमद
कि ख़ुद इंसान ढलता जा रहा है
नजीब अहमद
ख़ेमा-ए-जाँ की तनाबों को उखड़ा जाना था
नजीब अहमद