Ghazal Poetry (page 440)
आँख से ग़म निहाँ नहीं होते
नाहीद विर्क
ख़्वाबों के महल टूट के गिर जाते हैं अक्सर
नाहीद कौसर
हवा की हल्की सी आहट पे यूँ मचल जाना
नाहीद कौसर
सिले हों लब ज़बानें बंद तो बातें नहीं होतीं
नफ़ीर सरमदी
यूँ तो ख़ुद अपने ही साए से भी डर जाते हैं लोग
नफ़स अम्बालवी
यूँ नहीं था कि तीरगी कम थी
नफ़स अम्बालवी
वो मेरा दोस्त है और मुझ से वास्ता भी नहीं
नफ़स अम्बालवी
उम्र-भर दर्द के रिश्तों को निभाने से रहा
नफ़स अम्बालवी
सर-बरहना भरी बरसात में घर से निकले
नफ़स अम्बालवी
सहरा में जो मिला था मुझे इतना याद है
नफ़स अम्बालवी
न जाने कब की दबी तल्ख़ियाँ निकल आईं
नफ़स अम्बालवी
मिलते हैं मुस्कुरा के अगरचे तमाम लोग
नफ़स अम्बालवी
मज़हबी चिंगारियों से बस्तियाँ जल जाएँगी
नफ़स अम्बालवी
कौन सी शाख़ का पत्ता था हरा भूल गया
नफ़स अम्बालवी
जुनूँ है ज़ेहन में तो हौसले तलाश करो
नफ़स अम्बालवी
जो दश्त में मिला था मुझे इतना याद है
नफ़स अम्बालवी
इतनी मुश्किल में कभी पहले तो जाँ आई न थी
नफ़स अम्बालवी
हम पे वो मेहरबान कुछ कम है
नफ़स अम्बालवी
हम आज अपना मुक़द्दर बदल के देखते हैं
नफ़स अम्बालवी
घर किसी का भी हो जलता नहीं देखा जाता
नफ़स अम्बालवी
इक शो'ला-ए-हसरत हूँ मिटा क्यूँ नहीं देते
नफ़स अम्बालवी
धूप थी सहरा था लेकिन जिस्म का साया न था
नफ़स अम्बालवी
बे-लौस मोहब्बत का सिला ढूँढ रहा हूँ
नफ़स अम्बालवी
अगर चराग़ भी आँधी से डर गए होते
नफ़स अम्बालवी
अब किसी को क्या बताएँ किस क़दर नादान थे
नफ़स अम्बालवी
वो मिरे दिल में यूँ समा के गई
नईम जर्रार अहमद
वक़्त पर इश्क़-ए-ज़ुलेख़ा का असर लगता है
नईम जर्रार अहमद
वक़्त का सिलसिला नहीं रुकता
नईम जर्रार अहमद
तेरी आँखों के दो सितारे थे
नईम जर्रार अहमद
शुऊर-ए-ज़ात के साँचे में ढलना चाहता हूँ
नईम जर्रार अहमद