Ghazal Poetry (page 441)
सामने अपने तू बुला के तो देख
नईम जर्रार अहमद
मुझे रिफ़अ'तों का ख़ुमार था सो नहीं रहा
नईम जर्रार अहमद
मंज़िल है तो इक रस्ता-ए-दुश्वार में गुम है
नईम जर्रार अहमद
मंज़िल है कि इक रस्ता-ए-दुश्वार में गुम है
नईम जर्रार अहमद
लोग लड़ते रहे नाम आए तलब-गारों में
नईम जर्रार अहमद
किसी महल में न शाहों की आन-बान में है
नईम जर्रार अहमद
जो उस आँख से निकला होगा
नईम जर्रार अहमद
जफ़ा-ए-अहद का इल्ज़ाम उलट भी सकता हूँ
नईम जर्रार अहमद
हो गए हम शिकार फूलों के
नईम जर्रार अहमद
हर सच बात में हम दोनों हैं
नईम जर्रार अहमद
गिन रहे हैं दिल-ए-नाकाम के दिन
नईम जर्रार अहमद
ग़ैर के घर सही वो आया तो
नईम जर्रार अहमद
घड़ी जीता घड़ी मरता रहा हूँ
नईम जर्रार अहमद
फ़ैसला हो गया है रात गए
नईम जर्रार अहमद
चश्म-ओ-दिल साहब-ए-गुफ़्तार हुए जाते हैं
नईम जर्रार अहमद
बिखरा है कई बार समेटा है कई बार
नईम जर्रार अहमद
सुर्ख़ मिट्टी को हवाओं में उड़ाते हुए हम
नईम सरमद
ख़ुदा से भी कब कोई फ़ुर्क़त कटी है
नईम सरमद
ख़ुद को मुर्शिद मान ले प्यारे क्यूँ और क्या का भेद समझ
नईम सरमद
काफ़ से नून तलक शोर मचा वहशत है
नईम सरमद
अब के मौसम में तिरा शहर वो कैसा होगा
नईम सरमद
वहम है हस्त भी नीस्त भी वहम है
नईम रज़ा भट्टी
उस ने भी ख़ुद को बे-कनार किया
नईम रज़ा भट्टी
लोग जन्नत में जा रहे होंगे
नईम रज़ा भट्टी
कुछ ऐसा हो गया है यार अपना
नईम रज़ा भट्टी
कोई पल जी उठे अगर हम भी
नईम रज़ा भट्टी
है तल्ख़-तर हयात इस शराब से
नईम रज़ा भट्टी
दिल-ए-दरवेश की दुआ से उठा
नईम रज़ा भट्टी
बात ये है कि बात कोई नहीं
नईम रज़ा भट्टी
वो जितनी ख़ुद-नुमाई कर रहा है
नईम अख़्तर ख़ादिमी