Ghazal Poetry (page 442)

सच तो ये है कि उसे धूप ने गर्माया था

नईम अख़्तर

सबा-ओ-गुल को मह-ओ-नज्म को दिवाना किया

नईम अख़्तर

नशात-ए-आरज़ू का और क्या अंजाम लिक्खूंगा

नईम अख़्तर

ज़मीं लपेटता है आसमाँ समेटता है

नादिया अंबर लोधी

वो घर तिनकों से बनवाया गया है

नादिया अंबर लोधी

मुझ में सोए हुए माहताब से कम वाक़िफ़ है

नादिया अंबर लोधी

क्यूँ मैं बार-ए-दिगर जाऊँ

नादिया अंबर लोधी

इश्क़ की कोई तफ़्सीर थी ही नहीं

नादिया अंबर लोधी

हम को आग़ाज़-ए-सफ़र मारता है

नादिया अंबर लोधी

दीवारों पे क्या लिक्खा है

नादिया अंबर लोधी

आँखों को इक ख़्वाब दिखाया जा सकता है

नादिया अंबर लोधी

फिर अपने-आप से उस को हिजाब आता है

नादिर सिद्दीक़ी

हर कोई शहर में पाबंद-ए-अना लगता है

नादिर सिद्दीक़ी

ज़िंदगी अपनी कामयाब नहीं

नादिर शाहजहाँ पुरी

वो कभी माइल-ए-वफ़ा न हुआ

नादिर शाहजहाँ पुरी

मिरे मिटने पे गर तू भी मिटा होता तो क्या होता

नादिर शाहजहाँ पुरी

माँगना काम मुझ सवाली का

नादिर शाहजहाँ पुरी

लुट गया दिल कहाँ नहीं मालूम

नादिर शाहजहाँ पुरी

लगता नहीं कहीं भी मिरा दिल तिरे बग़ैर

नादिर शाहजहाँ पुरी

क्यूँ ये कहते हो क्या नहीं मालूम

नादिर शाहजहाँ पुरी

कोई उस ज़ालिम को समझाता नहीं

नादिर शाहजहाँ पुरी

किए क़रार मगर बे-क़रार ही रक्खा

नादिर शाहजहाँ पुरी

कौन कहता है ग़म मुसीबत है

नादिर शाहजहाँ पुरी

जो दर्द-ए-जिगर में कमी हो तो जानूँ

नादिर शाहजहाँ पुरी

हम उन के ग़म में तड़प रहे हैं जो ग़ैर से दिल लगा चुके हैं

नादिर शाहजहाँ पुरी

हम दिल फ़िदा करें कि तसद्दुक़-ए-जिगर करें

नादिर शाहजहाँ पुरी

दिल मिट गया तो ख़ैर ज़रूरत नहीं रही

नादिर शाहजहाँ पुरी

तशरीफ़ शब-ए-वा'दा जो वो लाए हुए हैं

नादिर लखनवी

सर कटा कर सिफ़त-ए-शम्अ' जो मर जाते हैं

नादिर लखनवी

रूह तन्हा गई जन्नत को सुबुक-सारी से

नादिर लखनवी