Ghazal Poetry (page 444)
जो रिवायत का मुंकिर हो आए
नदीम सिद्दीक़ी
गहरे समुंदरों में बिल-आख़िर उतर गए
नदीम सिद्दीक़ी
धरती से आकाश मिला दो
नदीम सिद्दीक़ी
ज़ख़्मों को कुरेदा है तो माज़ी निकल आया
नदीम माहिर
तिरी यादों की नक़्क़ाशी खुरच कर फेंक आए हैं
नदीम माहिर
सूरज और महताब बिखरते जाते हैं
नदीम माहिर
हम बुज़ुर्गों की आन छोड़ आए
नदीम माहिर
गिरते गिरते सँभल रहा हूँ मैं
नदीम माहिर
गर्द-ओ-ग़ुबार यूँ बढ़ा चेहरा बिखर गया
नदीम माहिर
एक ख़ौफ़-ओ-हिरास पानी में
नदीम माहिर
बाम-ओ-दर पर रेंगती परछाइयाँ
नदीम माहिर
आँखों से मनाज़िर का तसलसुल नहीं टूटा
नदीम माहिर
वस्ल ने जब मिरी तख़्लीक़ को ज़ंजीर क्या
नदीम गुल्लानी
तुम्हें हमारी मोहब्बतों के हसीन जज़्बे बुला रहे हैं
नदीम गुल्लानी
तुम्हारी महफ़िल से जा रहा हूँ मुझे दुआओं में याद रखना
नदीम गुल्लानी
तू समझता है गर फ़ुज़ूल मुझे
नदीम गुल्लानी
तिरी क़ुर्बतें हैं सकूँ जान-ए-जानाँ
नदीम गुल्लानी
साहिल पे तेरे ब'अद की वीरानी खा गई
नदीम गुल्लानी
फ़ुज़ूल वक़्त समझ के गुज़ार कर मुझ को
नदीम गुल्लानी
अपनी उलझन को बढ़ाने की ज़रूरत क्या है
नदीम गुल्लानी
न जाने कौन सी साअत में हो गया ग़ाएब
नदीम गोयाई
मैं अपने साथ कोई ऐसी चाल चल जाऊँ
नदीम गोयाई
धुआँ सा कोई हवाओं में सरसराएगा कुछ
नदीम गोयाई
यूँ ख़ुश-गुमान रक्खा गया उमर भर मुझे
नदीम फ़ाज़ली
वो यक-ब-यक उसे दल में उतारने का अमल
नदीम फ़ाज़ली
सब को ये फ़िक्र हाथ से अब एक पल न जाए
नदीम फ़ाज़ली
राज़-ए-फ़ितरत से अयाँ हो कोई मंज़र कोई धुन
नदीम फ़ाज़ली
रात की ज़ुल्फ़ कहीं ता-ब-कमर खुल जाए
नदीम फ़ाज़ली
मुश्किलें ख़ाल ख़ाल चाहते हैं
नदीम फ़ाज़ली
मअ'रका ही मअ'रका चारों तरफ़
नदीम फ़ाज़ली