Ghazal Poetry (page 445)

मरहला अब के दिगर है आइने के सामने

नदीम फ़ाज़ली

किसी भी रौशन ख़याल से आश्ना नहीं है

नदीम फ़ाज़ली

की तू ने लब-कुशाई तो किस के हुज़ूर की

नदीम फ़ाज़ली

कहाँ कोई ख़ज़ाना चाहता हूँ

नदीम फ़ाज़ली

जनम जनम की तकान होती न बाल-ओ-पर में

नदीम फ़ाज़ली

हर एक बात किसी बात पर है गोया तंज़

नदीम फ़ाज़ली

हमीं पे तंग ये वक़्त-ए-रवाँ हुआ तो क्या

नदीम फ़ाज़ली

इक क़ुर्ब जो क़ुर्बत को रसाई नहीं देता

नदीम फ़ाज़ली

दिल की राहें रौशन करते रहते हैं

नदीम फ़ाज़ली

बसीरतों का नज़र एहतिराम करती है

नदीम फ़ाज़ली

अपनी रूदाद यूँ बयाँ हो जाए

नदीम फ़ाज़ली

अजीब जंग-ओ-जिदाल हर पल है मेरे अंदर

नदीम फ़ाज़ली

अब अपनी ज़ात का इरफ़ान होने वाला है

नदीम फ़ाज़ली

आसमाँ इश्क़ की अज़्मत के सिवा भी कुछ है

नदीम फ़ाज़ली

आप को मुझ से ख़फ़ा मुझ से ख़फ़ा देखता हूँ

नदीम फ़ाज़ली

वो पथराई सी आँखों को भी काजल भेज देता है

नदीम फर्रुख

कुछ इस तरह से ज़माने पे छाना चाहता है

नदीम फर्रुख

कई सपने अधूरे रह गए हैं

नदीम फर्रुख

हाथों को कश्कोल बनाए बैठे हैं

नदीम फर्रुख

ग़म-ओ-ख़ुशी के अगर सिलसिले नहीं चलते

नदीम फर्रुख

भूल जाओगे तुम अगर मुझ को

नदीम फर्रुख

अल्फ़ाज़ बिक रहे थे ख़रीदे नहीं गए

नदीम फर्रुख

वक़्त की तरह तिरे हाथ से निकले हुए हैं

नदीम भाभा

तमाम उम्र जले और रौशनी नहीं की

नदीम भाभा

सुहुलत हो अज़िय्यत हो तुम्हारे साथ रहना है

नदीम भाभा

सफ़र की धूल को चेहरे से साफ़ करता रहा

नदीम भाभा

रूह हाज़िर है मिरे यार कोई मस्ती हो

नदीम भाभा

राब्ता मुझ से मिरा जोड़ दिया करता था

नदीम भाभा

मोहब्बत लाज़मी है मानता हूँ

नदीम भाभा

माँगते माँगते दुआ मिरे साथ

नदीम भाभा