Ghazal Poetry (page 447)

तिरी तलाश में है साएबान भी हम भी

नबील अहमद नबील

तेरी ख़्वाहिश न जब ज़ियादा थी

नबील अहमद नबील

तय हुआ है उस तरफ़ की रहगुज़र का जागना

नबील अहमद नबील

सूरत-ए-गुल कभी ज़ुल्फ़ों में सजा कर ले जाए

नबील अहमद नबील

सौ उलझनों के बीच गुज़ारा गया मुझे

नबील अहमद नबील

सर झुका कर शाह के दरबार में

नबील अहमद नबील

ले के हाथों में मोहब्बत के गुहर आए हैं

नबील अहमद नबील

लहू की आँच जैसा हो रहा है

नबील अहमद नबील

किसी को ख़ार किसी साँस को बबूल किया

नबील अहमद नबील

किस तरह बनाएँ हम अपना ये मकाँ यारो रेत इस नगर की है ईंट इस नगर की है

नबील अहमद नबील

किरन किरन ये किसी दीदा-ए-हसद में है

नबील अहमद नबील

कहीं जो अज़्म ज़रा हौसला निकल आए

नबील अहमद नबील

जो नक़्श मिट चुका है बनाना तो है नहीं

नबील अहमद नबील

जलन के ख़ौफ़ से बाहर निकल सको तो चलो

नबील अहमद नबील

जब से उम्मीद बाँधी पत्थर पर

नबील अहमद नबील

हम को ये डर है कि इम्कान किसी और का है

नबील अहमद नबील

हज़ार कोशिश-ए-पैहम के बावजूद हमें

नबील अहमद नबील

हरे हैं ज़ख़्म कुछ इस तरह भी मिरे सर के

नबील अहमद नबील

हर क़दम पाँव में हैं अंगारे

नबील अहमद नबील

हर एक ज़ख़्म की शिद्दत को कम किया जाता

नबील अहमद नबील

हर बदन को अब यहाँ ऐसा गहन लगने लगा

नबील अहमद नबील

हमारे सर पे ये अक्सर ग़ज़ब होता ही रहता है

नबील अहमद नबील

है जो बिगड़ी हुई सूरत मिरी बीमारी की

नबील अहमद नबील

फ़लक बनाया गया है ज़मीं बनाई गई

नबील अहमद नबील

इक यही अब मिरा हवाला है

नबील अहमद नबील

दूर कुछ अहल-ए-जुनूँ की बे-क़रारी कीजिए

नबील अहमद नबील

दिल धड़कनों में जैसे धड़कता उसी का था

नबील अहमद नबील

देख कर उठता हुआ शौक़ का सर या'नी तू

नबील अहमद नबील

चूर थे लोग जो संगीनी-ए-हिजरत से यहाँ

नबील अहमद नबील

चराग़ ज़ुल्मत-ए-बे-नूर में जलाना तिरा

नबील अहमद नबील