Ghazal Poetry (page 449)
पूछा कि वज्ह-ए-ज़िंदगी बोले कि दिलदारी मिरी
मुज़्तर ख़ैराबादी
पर्दा-ए-दर्द में आराम बटा करते हैं
मुज़्तर ख़ैराबादी
न किसी की आँख का नूर हूँ न किसी के दिल का क़रार हूँ
मुज़्तर ख़ैराबादी
न बुलवाया न आए रोज़ वा'दा कर के दिन काटे
मुज़्तर ख़ैराबादी
मुख़ालिफ़ है सबा-ए-नामा-बर कुछ और कहती है
मुज़्तर ख़ैराबादी
मोहब्बत को कहते हो बरती भी थी
मुज़्तर ख़ैराबादी
मोहब्बत कर के लाखों रंज झेले बेकली पाई
मुज़्तर ख़ैराबादी
मोहब्बत इब्तिदा में कुछ नहीं मा'लूम होती है
मुज़्तर ख़ैराबादी
मोहब्बत बा'इस-ए-ना-मेहरबानी होती जाती है
मुज़्तर ख़ैराबादी
मेरे महबूब तुम हो यार तुम हो दिल-रुबा तुम हो
मुज़्तर ख़ैराबादी
मेरे अरमाँ वो सुधारे यूँ के यूंहीं रह गए
मुज़्तर ख़ैराबादी
मिरे अरमान मायूसी के पाले पड़ते जाते हैं
मुज़्तर ख़ैराबादी
मकतब की आशिक़ी भी तारीख़-ए-ज़िंदगी थी
मुज़्तर ख़ैराबादी
माइल-ए-सोहबत-ए-अग़्यार तो हम हैं तुम कौन
मुज़्तर ख़ैराबादी
क्या कहूँ हसरत-ए-दीदार ने क्या क्या खींचा
मुज़्तर ख़ैराबादी
किसी के संग-ए-दर से अपनी मय्यत ले के उट्ठेंगे
मुज़्तर ख़ैराबादी
किसी बुत की अदा ने मार डाला
मुज़्तर ख़ैराबादी
कैसे दिल लगता हरम में दौर-ए-पैमाना न था
मुज़्तर ख़ैराबादी
जुनूँ के जोश में इंसान रुस्वा हो ही जाता है
मुज़्तर ख़ैराबादी
जुदाई मुझ को मारे डालती है
मुज़्तर ख़ैराबादी
जो पूछा मुँह दिखाने आप कब चिलमन से निकलेंगे
मुज़्तर ख़ैराबादी
जफ़ा से वफ़ा मुस्तरद हो गई
मुज़्तर ख़ैराबादी
जब कहा तीर तिरी आँख ने अक्सर मारा
मुज़्तर ख़ैराबादी
जब कहा मैं ने कि मर मर के बचे हिज्र में हम
मुज़्तर ख़ैराबादी
जब कहा मैं हूँ तिरे इश्क़ में बदनाम कि तू
मुज़्तर ख़ैराबादी
जान ये कह के बुत-ए-होश-रुबा ने ले ली
मुज़्तर ख़ैराबादी
इतने अच्छे हो कि बस तौबा भली
मुज़्तर ख़ैराबादी
इस बात का मलाल नहीं है कि दिल गया
मुज़्तर ख़ैराबादी
इलाज-ए-दर्द-ए-दिल तुम से मसीहा हो नहीं सकता
मुज़्तर ख़ैराबादी
हम ने पाई लज़्ज़त-ए-दीदार लेकिन दूर से
मुज़्तर ख़ैराबादी