Ghazal Poetry (page 450)
हम वफ़ा करते हैं हम पर जौर कोई क्यूँ करे
मुज़्तर ख़ैराबादी
हम उम्र के साथ हैं सफ़र में
मुज़्तर ख़ैराबादी
हिज्र में हो गया विसाल का क्या
मुज़्तर ख़ैराबादी
हौसला इम्तिहान से निकला
मुज़्तर ख़ैराबादी
ग़ुरूर-ए-उल्फ़त की तर्ज़-ए-नाज़िश अजब करिश्मे दिखा रही है
मुज़्तर ख़ैराबादी
ग़ुरूर-ए-उल्फ़त की तर्ज़-ए-नाज़िश अजब करिश्मे दिखा रही है
मुज़्तर ख़ैराबादी
गवाह-ए-वस्ल-ए-अदू सर झुका के देख न लो
मुज़्तर ख़ैराबादी
फ़स्ल-ए-गुल भी तरस के काटी है
मुज़्तर ख़ैराबादी
इक पर्दा-नशीं की आरज़ू है
मुज़्तर ख़ैराबादी
इक नक़्श-ए-ख़याल रू-ब-रू है
मुज़्तर ख़ैराबादी
दूर क्यूँ जाऊँ यहीं जल्वा-नुमा बैठा है
मुज़्तर ख़ैराबादी
दुआ से कुछ न हुआ इल्तिजा से कुछ न हुआ
मुज़्तर ख़ैराबादी
दिल-दादगान-ए-हुस्न से पर्दा न चाहिए
मुज़्तर ख़ैराबादी
दिल ले के हसीनों ने ये दस्तूर निकाला
मुज़्तर ख़ैराबादी
दिल का मोआ'मला जो सुपुर्द-ए-नज़र हुआ
मुज़्तर ख़ैराबादी
दम-ए-ख़्वाब-ए-राहत बुलाया उन्हों ने तो दर्द-ए-निहाँ की कहानी कहूँगा
मुज़्तर ख़ैराबादी
दम-ए-आख़िर मुसीबत काट दो बहर-ए-ख़ुदा मेरी
मुज़्तर ख़ैराबादी
चाहत की नज़र आप से डाली भी गई है
मुज़्तर ख़ैराबादी
बैठे हुए हैं हम ख़ुद आँखों में धूल डाले
मुज़्तर ख़ैराबादी
असीर-ए-पंजा-ए-अहद-ए-शबाब कर के मुझे
मुज़्तर ख़ैराबादी
अपने अहद-ए-वफ़ा को भूल गए
मुज़्तर ख़ैराबादी
ऐश के रंग मलालों से दबे जाते हैं
मुज़्तर ख़ैराबादी
अगर तुम दिल हमारा ले के पछताए तो रहने दो
मुज़्तर ख़ैराबादी
अब इस से बढ़ के क्या नाकामियाँ होंगी मुक़द्दर में
मुज़्तर ख़ैराबादी
आतिश-ए-हुस्न से इक आब है रुख़्सारों में
मुज़्तर ख़ैराबादी
आरज़ू दिल में बनाए हुए घर है भी तो क्या
मुज़्तर ख़ैराबादी
आप क्यूँ बैठे हैं ग़ुस्से में मिरी जान भरे
मुज़्तर ख़ैराबादी
हर इक सलीब-ओ-दार का नज़्ज़ारा हम हुए
मुज़्तर हैदरी
सिर्फ़ पटरी बनी रही मुझ में
मुज़दम ख़ान
मुसाफ़िर को सफ़र का मसअला है
मुज़दम ख़ान