Ghazal Poetry (page 451)
मुझे बताएँ कि टेंशन क्या है
मुज़दम ख़ान
मौत की कब रुकी है गाड़ी दोस्त
मुज़दम ख़ान
कोई भी इश्क़ में उतनी ही देर टिकता है
मुज़दम ख़ान
घुस घुसा कर सही रवाँ तो है
मुज़दम ख़ान
चश्म का कर रहा हूँ तर तब्दील
मुज़दम ख़ान
अगर कहने से पहले हो रहा है
मुज़दम ख़ान
आदमी आदमी के बस का नहीं
मुज़दम ख़ान
ज़ुल्फ़ रुख़ पे सवार करते हुए
मुज़म्मिल हुसैन चीमा
ज़िंदगी ख़्वाब की तरह देखी
मुज़फ़्फ़र वारसी
ज़िंदगी खिंच गई मुझ से तिरे अबरू की तरह
मुज़फ़्फ़र वारसी
ज़िंदगी जिस पर हँसे ऐसी कोई ख़्वाहिश न की
मुज़फ़्फ़र वारसी
ज़ख़्म-ए-दिल और हरा ख़ून-ए-तमन्ना से हुआ
मुज़फ़्फ़र वारसी
ये फ़ैसला तो बहुत ग़ैर-मुंसिफ़ाना लगा
मुज़फ़्फ़र वारसी
वो रोकता है मुझे शहर में निकलने से
मुज़फ़्फ़र वारसी
तेरी झलक निगाह के हर ज़ाविए में है
मुज़फ़्फ़र वारसी
सुख़न-वरी हमें कब तजरिबे से आई है
मुज़फ़्फ़र वारसी
साया कोई मैं अपने ही पैकर से निकालूँ
मुज़फ़्फ़र वारसी
सफ़र भी दूर का है राह आश्ना भी हैं
मुज़फ़्फ़र वारसी
रौशनी के रूप में ख़ुश्बू में या रंगों में आ
मुज़फ़्फ़र वारसी
रात गए यूँ दिल को जाने सर्द हवाएँ आती हैं
मुज़फ़्फ़र वारसी
फिर चाहे जितनी क़ामत ले कर आ जाना
मुज़फ़्फ़र वारसी
पत्थर मुझे शर्मिंदा-ए-गुफ़तार न कर दे
मुज़फ़्फ़र वारसी
निखर सका न बदन चाँदनी में सोने से
मुज़फ़्फ़र वारसी
नक़्श दिल पर कैसी कैसी सूरतों का रह गया
मुज़फ़्फ़र वारसी
मुंतज़िर रहना भी क्या चाहत का ख़म्याज़ा नहीं
मुज़फ़्फ़र वारसी
मेरी सोच मुझे किस रुतबे पर ले आई
मुज़फ़्फ़र वारसी
माना कि मुश्त-ए-ख़ाक से बढ़ कर नहीं हूँ मैं
मुज़फ़्फ़र वारसी
मैं हरे मौसमों में जलता रहा
मुज़फ़्फ़र वारसी
लिया जो उस की निगाहों ने जाएज़ा मेरा
मुज़फ़्फ़र वारसी
क्या भला मुझ को परखने का नतीजा निकला
मुज़फ़्फ़र वारसी