Ghazal Poetry (page 453)
ख़ुद से उकताए हुए अपना बुरा चाहते हैं
मुज़फ़्फ़र मुम्ताज़
हक़ीक़तों से मगर मुन्हरिफ़ रहा न गया
मुज़फ़्फ़र मुम्ताज़
शहर-ए-बे-सौत में अमाँ मिल जाए
मुज़फ़्फ़र इरज
ख़ुशबू बदन की ख़ाली समुंदर हवाओं के
मुज़फ़्फ़र इरज
फ़ासलों की बर्फ़ पिघलेगी मुझे ये डर न था
मुज़फ़्फ़र इरज
यूँ तोड़ न मुद्दत की शनासाई इधर आ
मुज़फ़्फ़र हनफ़ी
ये इज़्तिराब देखना ये इंतिशार देखना
मुज़फ़्फ़र हनफ़ी
वो एक पल का साथ ब-वक़्त-ए-नमाज़ है
मुज़फ़्फ़र हनफ़ी
वजूद-ए-ग़ैब का इरफ़ान टूट जाता है
मुज़फ़्फ़र हनफ़ी
उस तरफ़ वो जो नज़र पड़ता है
मुज़फ़्फ़र हनफ़ी
तुम ने जी भर के सताने की क़सम खाई है
मुज़फ़्फ़र हनफ़ी
तूफ़ान-ए-बला से जो मैं बच कर गुज़र आया
मुज़फ़्फ़र हनफ़ी
तिनकों के अरमान लब्बैक लब्बैक
मुज़फ़्फ़र हनफ़ी
सूखा बाँझ महीना मौला पानी दे
मुज़फ़्फ़र हनफ़ी
शामियाने मिरी ग़ीबत में हवा तानती है
मुज़फ़्फ़र हनफ़ी
शाख़ों पर इबहाम के पैकर लटक रहे हैं
मुज़फ़्फ़र हनफ़ी
शहर भर में कहीं रौनक़ थी न ताबानी थी
मुज़फ़्फ़र हनफ़ी
रहता है हर वक़्त क़लक़ में
मुज़फ़्फ़र हनफ़ी
पीर-ए-मुग़ाँ को क़िबला-ए-हाजात कह गया
मुज़फ़्फ़र हनफ़ी
पहले हम उस की महफ़िल में जाने से कतराए तो
मुज़फ़्फ़र हनफ़ी
लाइक़-ए-दीद वो नज़ारा था
मुज़फ़्फ़र हनफ़ी
क्या वस्ल की साअत को तरसने के लिए था
मुज़फ़्फ़र हनफ़ी
क्या करता मैं हम-अस्रों ने तन्हा मुझ पर छोड़ दिया
मुज़फ़्फ़र हनफ़ी
ख़ुश्क आँखों से निकल कर आसमाँ पर फैल जा
मुज़फ़्फ़र हनफ़ी
ख़ुद मुझ को भी मालूम नहीं है कि मैं क्या हूँ
मुज़फ़्फ़र हनफ़ी
कई सूखे हुए पत्ते हरे मालूम होते हैं
मुज़फ़्फ़र हनफ़ी
कहाँ तो पा-ए-सफ़र को राह-ए-हयात कम थी
मुज़फ़्फ़र हनफ़ी
जो होंटों पे मोहर-ए-ख़मोशी लगा दी
मुज़फ़्फ़र हनफ़ी
जाँ-ब-लब वैसे ही थे और हमें मार चला
मुज़फ़्फ़र हनफ़ी
इस खुरदुरी ग़ज़ल को न यूँ मुँह बना के देख
मुज़फ़्फ़र हनफ़ी