Ghazal Poetry (page 455)

ऐ दोस्त मुझे सोज़-ए-निहाँ मार न डाले

मुज़फ्फ़र अहमद मुज़फ्फ़र

आमद-ए-फ़स्ल-ए-बहाराँ नहीं जीने देती

मुज़फ्फ़र अहमद मुज़फ्फ़र

यक़ीन आज भी वहम-ओ-गुमान में गुम है

मुज़फ़्फ़र अबदाली

रीत पर इक निशान है शायद

मुज़फ़्फ़र अबदाली

रेत के शानों पे शबनम की नमी रात गए

मुज़फ़्फ़र अबदाली

रौनक़-ए-अर्ज़-ओ-समा शम्स ओ क़मर मैं ही हूँ

मुज़फ़्फ़र अबदाली

मैं जो बद-हवास था महव-ए-कयास तुम भी थे

मुज़फ़्फ़र अबदाली

किस ने देखी है बहारों में ख़िज़ाँ मेरे सिवा

मुज़फ़्फ़र अबदाली

ख़्वाब उम्मीद से सरशार भी हो जाए तो क्या

मुज़फ़्फ़र अबदाली

ख़ुदा भी कैसा हुआ ख़ुश मिरे क़रीने पर

मुज़फ़्फ़र अबदाली

ख़मोशी की गिरह खोले सर-ए-आवाज़ तक आए

मुज़फ़्फ़र अबदाली

ख़ल्वत-ए-जाँ से चली बात ज़बाँ तक पहुँची

मुज़फ़्फ़र अबदाली

बयाबाँ को पशेमानी बहुत है

मुज़फ़्फ़र अबदाली

वो सामने भी नहीं फिर भी उन का शक क्यूँ है

मतरब निज़ामी

तल्ख़ी-ए-नौ शकर-आमेज़ हुई जाती है

मतरब निज़ामी

फूल को ख़ार लिखें ख़ार को शबनम लिक्खें

मतरब निज़ामी

मैं इक किरन हूँ उजाला है तमकनत मेरी

मतरब निज़ामी

महके जब रात-की-रानी तो मुझे ख़त लिखना

मतरब निज़ामी

लाला-ओ-गुल का लहू भी राएगाँ होने लगा

मतरब निज़ामी

धूप पे कैसी गर्द पड़ी है

मतरब निज़ामी

बयान-ए-शौक़ को मफ़्हूम से जुदा न करे

मतरब निज़ामी

ये माहताब ये सूरज किधर से आए हैं

मुस्तहसिन ख़्याल

शब-ए-फ़िराक़ के दम तोड़े हुए लम्हो

मुस्तहसिन ख़्याल

जब कि मानूस था आलाम के गिर्दाब से भी

मुस्तहसिन ख़्याल

इस ख़िज़ाँ की रुत में अपना साथ अच्छा रह गया

मुस्तहसिन ख़्याल

फ़रेब-ए-हिज्र में लम्हे सभी विसाल के हैं

मुस्तहसिन ख़्याल

अब ये खुला कि इश्क़ का पिंदार कुछ नहीं

मुस्तहसिन ख़्याल

रूखी-सूखी खा सकते थे

मुस्तहसन जामी

रंग-ओ-सिफ़ात-ए-यार में दिल ढल नहीं रहा

मुस्तहसन जामी

रंगों की पहचान नहीं कर सकता था

मुस्तहसन जामी