Ghazal Poetry (page 454)

ग़ौग़ा खटपट चीख़म धाड़

मुज़फ़्फ़र हनफ़ी

फ़र्क़ नहीं पड़ता हम दीवानों के घर में होने से

मुज़फ़्फ़र हनफ़ी

इक मसरफ़-ए-औक़ात-ए-शबीना निकल आया

मुज़फ़्फ़र हनफ़ी

दीवारों पर गीली रेखाएँ रोती हैं

मुज़फ़्फ़र हनफ़ी

दरिया-ए-शब के पार उतारे मुझे कोई

मुज़फ़्फ़र हनफ़ी

बसारतों पे भँवर इंकिशाफ़ करता है

मुज़फ़्फ़र हनफ़ी

बने हुए हैं फ़सील-ए-नज़र दर-ओ-दीवार

मुज़फ़्फ़र हनफ़ी

बाब-ए-तिलिस्म-ए-होश-रुबा मिल गया मुझे

मुज़फ़्फ़र हनफ़ी

आलाम-ए-रोज़गार का मुँह ज़र्द हो गया

मुज़फ़्फ़र हनफ़ी

आँखों में वीरानी सी है पलकें भीगी बाल खुले

मुज़फ़्फ़र हनफ़ी

बीते लम्हों को ढूँढता हूँ मैं

मुज़फ्फ़र बुख़ारी

सुनिए पयाम-ए-शम्स-ओ-क़मर रक़्स कीजिए

मुज़फ्फर अली सय्यद

'सय्यद' तुम्हारे ग़म की किसी को ख़बर नहीं

मुज़फ्फर अली सय्यद

क़तरे में भी छुपे हैं भँवर रक़्स कीजिए

मुज़फ्फर अली सय्यद

क्या ग़म जो फ़लक से कोई उतरा न सर-ए-ख़ाक

मुज़फ्फर अली सय्यद

कौन कहता है मुसीबत पर कभी मातम न कर

मुज़फ्फर अली सय्यद

काम कोई तो कभी वक़्त से आगे कर जा

मुज़फ्फर अली सय्यद

जवानी मगर इस क़दर मस्तियाँ

मुज़फ्फर अली सय्यद

हर एक राह से आगे है ख़्वाब की मंज़िल

मुज़फ्फर अली सय्यद

दहन-ए-मेहमान में काँटे

मुज़फ्फर अली सय्यद

बहुत नहीफ़ है तर्ज़-ए-फ़ुग़ाँ बदल डालो

मुज़फ्फर अली सय्यद

आह कब लब पर नहीं है दाग़ कब दिल में नहीं

मुज़फ़्फ़र अली असीर

शरीक-ए-रस्म-ए-गिर्या हैं समुंदर-आश्ना आँखें

मुज़फ्फ़र अहमद मुज़फ्फ़र

मोहब्बत दिल पे करती है असर आहिस्ता आहिस्ता

मुज़फ्फ़र अहमद मुज़फ्फ़र

कोई महरूम-ए-मोहब्बत न रहा मेरे बा'द

मुज़फ्फ़र अहमद मुज़फ्फ़र

ख़ुद तमाशा बन गई चश्म-ए-तमाशाई कि बस

मुज़फ्फ़र अहमद मुज़फ्फ़र

जो लज़्ज़त-ए-आशना-ए-दर्द-ए-हिज्राँ होते जाते हैं

मुज़फ्फ़र अहमद मुज़फ्फ़र

हम तल्ख़ी-ए-हयात को आसाँ न कर सके

मुज़फ्फ़र अहमद मुज़फ्फ़र

इक तू ही नहीं नासिया-फ़रसा मिरे आगे

मुज़फ्फ़र अहमद मुज़फ्फ़र

बार-ए-ख़ातिर हुई ये उम्र-ए-गुरेज़ाँ जानाँ

मुज़फ्फ़र अहमद मुज़फ्फ़र