Ghazal Poetry (page 452)

कुछ ऐसा उतरा मैं उस संग-दिल के शीशे में

मुज़फ़्फ़र वारसी

ख़ुद मिरी आँखों से ओझल मेरी हस्ती हो गई

मुज़फ़्फ़र वारसी

कब निशाँ मेरा किसी को शब-ए-हस्ती में मिला

मुज़फ़्फ़र वारसी

जी बहलता ही नहीं साँस की झंकारों से

मुज़फ़्फ़र वारसी

हम क्यूँ ये कहें कोई हमारा नहीं होता

मुज़फ़्फ़र वारसी

हम करें बात दलीलों से तो रद्द होती है

मुज़फ़्फ़र वारसी

हाथ आँखों पे रख लेने से ख़तरा नहीं जाता

मुज़फ़्फ़र वारसी

गहराइयों में ज़ेहन की गिर्दाब सा रहा

मुज़फ़्फ़र वारसी

डुबोने वालों को शर्मिंदा कर चुका हूँगा

मुज़फ़्फ़र वारसी

दिल हो हस्सास तो जीने में बहुत घाटा है

मुज़फ़्फ़र वारसी

दीदा-ए-संग में बीनाई कहाँ से आए

मुज़फ़्फ़र वारसी

चाप आए कि मुलाक़ात हो आवाज़े से

मुज़फ़्फ़र वारसी

अब के बरसात की रुत और भी भड़कीली है

मुज़फ़्फ़र वारसी

आग से सैराब दश्त-ए-ज़िंदगानी हो गया

मुज़फ़्फ़र वारसी

आदमी चौंक चुका है मगर उट्ठा तो नहीं

मुज़फ़्फ़र वारसी

याद ये किस की आ गई ज़ेहन का बोझ उतर गया

मुज़फ़्फ़र रज़्मी

शाम-ए-ग़म है तिरी यादों को सजा रक्खा है

मुज़फ़्फ़र रज़्मी

नाकामी-ए-क़िस्मत का गिला छोड़ दिया है

मुज़फ़्फ़र रज़्मी

मुक़ाबले तो ग़लत-फ़हमियाँ बढ़ाते हैं

मुज़फ़्फ़र रज़्मी

मसअले भी मिरे हमराह चले आते हैं

मुज़फ़्फ़र रज़्मी

कोई सौग़ात-ए-वफ़ा दे के चला जाऊँगा

मुज़फ़्फ़र रज़्मी

ख़ुद पुकारेगी जो मंज़िल तो ठहर जाऊँगा

मुज़फ़्फ़र रज़्मी

इस राज़ को क्या जानें साहिल के तमाशाई

मुज़फ़्फ़र रज़्मी

हुजूम-ए-ग़म में किस ज़िंदा-दिली से

मुज़फ़्फ़र रज़्मी

फ़राज़-ए-दार पे इक दिन सजा के देख हमें

मुज़फ़्फ़र रज़्मी

अभी ख़ामोश हैं शोलों का अंदाज़ा नहीं होता

मुज़फ़्फ़र रज़्मी

सुकूँ अगर है तो बस लुत्फ़ इंतिज़ार में है

मुज़फ़्फ़र मुम्ताज़

रात के पर्दे में इक नूर का सैलाब भी है

मुज़फ़्फ़र मुम्ताज़

मुझी में डूब गया दुश्मनी निभाते हुए

मुज़फ़्फ़र मुम्ताज़

किस ख़्वाब का असर है जो अब तक नज़र में है

मुज़फ़्फ़र मुम्ताज़