Ghazal Poetry (page 448)
चारों जानिब पागल-ख़ाने लगते हैं
नबील अहमद नबील
बुझती मशअ'ल की इल्तिजा जैसे
नबील अहमद नबील
बला की धूप में ऐसे भी जिस्म जलता रहा
नबील अहमद नबील
ऐसी उलझन हो कभी ऐसी भी रुस्वाई हो
नबील अहमद नबील
ऐसी उलझन हो कभी ऐसी भी रुस्वाई हो
नबील अहमद नबील
ऐसे वो दास्तान खींचता है
नबील अहमद नबील
आँखों के इज़्तिराब से ऐसे झड़े हैं ख़्वाब
नबील अहमद नबील
आई है ऐसे ग़म में रवानी परत परत
नबील अहमद नबील
वो कौन है दुनिया में जो मजबूर नहीं है
नाज़ मुरादाबादी
मिरी जुस्तुजू का हासिल मिरा शौक़-ए-वालिहाना
नाज़ मुरादाबादी
गुज़र कर आदमी राह-मुसीबत से सँवरता है
नाज़ मुरादाबादी
ग़ुंचे ग़ुंचे पे गुलिस्ताँ के निखार आ जाए
नाज़ मुरादाबादी
दिल शब-ए-फ़ुर्क़त सुकूँ की जुस्तुजू करता रहा
नाज़ मुरादाबादी
अक़्ल गहवारा-ए-औहाम हुई जाती है
नाज़ मुरादाबादी
ज़ेर-ए-ज़मीं रहूँ कि तह-ए-आसमाँ रहूँ
मुज़्तर ख़ैराबादी
ये तुम बे-वक़्त कैसे आज आ निकले सबब क्या है
मुज़्तर ख़ैराबादी
वो क़ज़ा के रंज में जान दें कि नमाज़ जिन की क़ज़ा हुई
मुज़्तर ख़ैराबादी
वक़्त-ए-आख़िर याद है साक़ी की मेहमानी मुझे
मुज़्तर ख़ैराबादी
वफ़ा क्या कर नहीं सकते हैं वो लेकिन नहीं करते
मुज़्तर ख़ैराबादी
उस से कह दो कि वो जफ़ा न करे
मुज़्तर ख़ैराबादी
उन्हों ने क्या न किया और क्या नहीं करते
मुज़्तर ख़ैराबादी
उन्हीं लोगों की बदौलत ये हसीं अच्छे हैं
मुज़्तर ख़ैराबादी
उम्र काटी बुतों की आड़ों में
मुज़्तर ख़ैराबादी
तू मुझे किस के बनाने को मिटा बैठा है
मुज़्तर ख़ैराबादी
तेरी रंगत बहार से निकली
मुज़्तर ख़ैराबादी
सहें कब तक जफ़ाएँ बेवफ़ाई देखने वाले
मुज़्तर ख़ैराबादी
सब शरीक-ए-सदमा-ओ-आज़ार कुछ यूँही से हैं
मुज़्तर ख़ैराबादी
रुख़ किसी का नज़र नहीं आता
मुज़्तर ख़ैराबादी
रवाँ रहता है किस की मौज में दिन रात तू पानी
मुज़्तर ख़ैराबादी
रह के पर्दे में रुख़-ए-पुर-नूर की बातें न कर
मुज़्तर ख़ैराबादी